• पूर्ण विकसित जागृत इकाई में आत्मानुवर्ती बुद्धि, चित्त, वृत्ति एवं मन की क्रियाएं मध्यस्थीकरण प्रणाली से नियंत्रित होती हैं, जिसके फलस्वरूप ही सुख, शांति, संतोष एवं आनंद की प्रतिष्ठा होता है ।
  • क्रिया से मुक्त इकाई नहीं है । सम, विषम एवं मध्यस्थ क्रिया का होना पाया जाता है । जैसा कि उपरवर्णित है सम तथा विषम क्रियाओं में संतुलन नहीं है । इसलिये यह सिद्ध होता है कि मध्यस्थीकरण प्रणाली से इकाई को मध्यस्थ क्रिया से संतुलित किया जाता है। इस प्रकार मध्यस्थ की ही क्रियाशीलता प्रमाणित होती है तथा सम और विषम इसके नियंत्रित सिद्ध हैं ।
  • इकाई हो और निष्क्रिय हो ऐसी कोई संभावना नहीं है ।
  • मानव में व्यवहारिक मध्यस्थता न्याय से, वैचारिक मध्यस्थता समाधान (धर्म) से तथा अनुभव की मध्यस्थता ज्ञान से है ।
  • समस्त व्यवहार नियम से नियंत्रित हैं । नियम मानव के आचरण के रूप में प्रमाण है ।
  • विचार मात्र समाधान से नियंत्रित है, जो जागृति का प्रमाण है ।
  • अनुभव मात्र व्यापकता में है, जो शून्य है ।
  • अत: यह सिद्ध होता है कि शून्य ही ज्ञान, ज्ञान ही व्यापक तथा व्यापक ही ज्ञान है । सहअस्तित्व में अनुभव ही ज्ञान सहज प्रमाण है । जो ज्ञान (व्यापक) में अनन्त इकाईयाँ सम्पृक्त होने की समझ ही है, व्यापक में अनंत प्रकृति की अविभाज्यता ही सहअस्तित्व है।
  • जागृत मानव में न्याय पूर्ण व्यवहार तथा समाधान पूर्ण विचारों को पाया जाता है ।
  • अनुभूति मात्र सहअस्तित्व रूपी सत्य में ही है । सत्य में अनुभूति ज्ञानावस्था की निर्भ्रम इकाई द्वारा ही होती है तथा इसका प्रभाव बुद्धि, चित्त, वृत्ति तथा मन में आप्लावन होता है ।
  • अनुभव सहज व्यवहारिक मध्यस्थता जो वृत्ति की क्रिया है, न्याय और समाधान के रूप में परिलक्षित होती है ।
  • अनुभव सहज बोध की स्थिति में बुद्धि की क्रिया में आप्लावन होता है ।
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