- ● असंग्रह समाधान-समृद्धि, स्नेह, विद्या, निराभिमानता (सरलता), अभय एवं वाणी संयम से युक्त विचार मात्र से वैचारिक स्वर्गीयता की, स्वनारी/स्वपुरुष तथा स्वधन एवं दया पूर्ण व्यवहार से व्यवहारिक सुख अथवा व्यवहारिक स्वर्गीयता की उपलब्धियाँ हैं । यही सर्वमानव के लिए आवश्यकीय नियम है ।
- # इसके विपरीत संग्रह, द्वेष, अविद्या, अभिमान (दिखावा), भय तथा वाणी की असंयमता से युक्त विचार से वैचारिक नारकीयता का तथा परनारी/परपुरुष, परधन एवं परपीड़ा रत कार्य एवं व्यवहार से व्यवहारिक क्लेशों से पीड़ित होना होता है ।
- ● मानव-मानव के लिए आवश्यकीय नियमानुक्रम, व्यतिक्रम भेद से ही सुख व दु:ख का, हर्ष एवं अमर्ष का कारण सिद्ध हुआ है ।
- ● समस्त संबंधों एवं संपर्कों, वस्तु एवं विषय, रूप एवं आशय के पोषक एवं शोषक भेद से ही मानव ने नियम का पालन किया है । इनमें से मानवीयता के लिये आवश्यकीय तथा अनावश्यकीय नियमों को जान व समझ लेना ही अध्ययन है तथा इनमें से आवश्यकीय वर्गों को सभी स्तरों पर प्रयोग में लाना ही प्रमाण और उपलबिॅध है ।
- ● मानव जीने के सोपानों को व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र, अर्न्तराष्ट्र के परिप्रेक्ष्यों के रूप में पहचाना गया है । दूसरी विधि से व्यक्ति, परिवार, अखंड समाज, सार्वभौम व्यवस्था रूप में पहचान होती है । तीसरी विधि से हर व्यक्ति, समझदारी सहज विधि से जिम्मेदारी के रूप में व्यवस्था का आरंभिक स्वरूप परिवार है, इसी क्रम में दश सोपानीय परिवार सभाओं के रूप में पहचान होता है ।
- ● मानव के लिये आवश्यकीय नियम ही न्याय, न्याय ही धर्म, धर्म ही सत्य, सत्य ही सहअस्तित्व, सहअस्तित्व में समझ ही आनंद, आनंद ही जागृत जीवन तथा जागृत मानव जीवन ही मानव परंपरा के लिये आवश्यकीय नियम है, यह मानव जीवन का जागृत चक्र है । सर्व मानव जीवन के लिये यह सुचक्र है ।
- ● जीने की आशा सहित चैतन्य इकाई को ‘जीवन’ तथा जीवन द्वारा लक्ष्य को पाने के क्रम में प्रयास की जो निरंतरता है, उसकी जीवन जागृति क्रम संज्ञा है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द