• उपरोक्तानुसार न्याय, धर्म या समाधान अनुभव के ही विविध स्तर हैं ।
  • इसलिए व्यवहार में अनुभव तथ्य न्याय है, विचार में अनुभव तथ्य धर्म है और आत्मानुभूत तथ्य सहअस्तित्व है । यही परम सत्य है ।
  • व्यवहारिक मध्यस्थता, सम-विषम व्यवहार के बीच मध्यस्थता करने की पात्रता से है जो न्याय के रूप में होता है । वैचारिक मध्यस्थता सम, विषम विचारों का समाधान प्रस्तुत करने योग्य योग्यता से है तथा अनुभव मध्यस्थ ही है ।
  • आत्मा में जागृति व्यापक वस्तु में अनुभूति क्रिया संपन्न होने की क्षमता तक बुद्धि व चित्त की जागृति विचारों में समाधान प्रस्तुत करने योग्य क्षमता तक वृत्ति तथा मन की जागृति समस्त व्यवहार व क्रिया को न्याय से समन्वित व्यवहार को प्रस्तुत करने की क्षमता की सीमा तक है ।
  • आसक्ति रहित इकाई में अकर्तृत्व भ्रम मुक्ति रुप में होता है । अधिकाधिक उपकार करने के उपरांत भी और करने की स्वीकृति रहती है ।
  • आसक्ति भ्रम ही है ।
  • सम, विषम विचार तथा व्यवहार दोनों आस्वादन क्रियाएं हैं ।
  • आस्वादन :- समाधान सहज प्रयोजन के अर्थ में आशा एवं रुचि सहित ग्रहण क्रिया की ही आस्वादन संज्ञा है ।
  • ईष्ट दिशा में प्रवृत्ति हो तथा अन्य दिशाओं में प्रवृत्ति न हो, उसकी ऐच्छिक निराकर्षण संज्ञा है । संपूर्ण दिशाओं में प्रमाणित होने वाली ही पूर्ण निराकर्षण संज्ञा है ।
  • निराकर्षण ही अनासक्ति, यही जागृति है। अनासक्ति ही अकर्तृत्व, अकर्तृत्व ही असंचयता, असंचयता ही अभय समृद्धि, अभय समृद्धि ही स्वर्गीयता, स्वर्गीयता ही निराभिमानता, निराभिमानता ही पर-वैराग्य, पर-वैराग्य ही योग, योग ही व्यापकता में अनुभव, व्यापकता में अनुभव ही मध्यस्थता, मध्यस्थता ही प्रामाणिकता, प्रामाणिकता ही निराकर्षण अथवा भ्रममुक्ति है ।
  • मानव समाज का पोषण एवं सम्वर्धन जीवन मुक्त अथवा भ्रम मुक्त मानवों का स्वभाव है।
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