• विषय चतुष्टय में आसक्ति सबीज है ।
  • ऐषणात्रय सहित किया गया व्यवहार अखण्ड समाज व्यवस्था के अर्थ में सबीज है ।
  • ऐषणा मुक्त विचार ही निर्बीज विचार है जो दिव्य मानव कोटि का स्वभाव है ।
  • व्यष्टि के अस्तित्व में पाया जाने वाला अभिमान व अहंकार ही संकीर्णता व क्लेश का मूल कारण है ।
  • समष्टि के अस्तित्व की यथार्थ समझ से उदारता एवम् कृतज्ञता की उपलब्धि होती है और व्यापक सत्ता में अनुभूति से भ्रान्ति का उन्मूलन होता है ।
  • यथार्थ दर्शन के बिना मानवीय विचार, मानवीय विचार के बिना मानवीय कार्य-व्यवहार में प्रवृत्ति, मानवीय कार्य-व्यवहार के बिना व्यवहार की एकसूत्रता, व्यवहार की एकसूत्रता के बिना निर्विरोधिता, निर्विरोधिता के बिना निर्विरोधिता पूर्ण समाज, निर्विरोधता पूर्ण समाज के बिना सहअस्तित्व, सहअस्तित्व के बिना समाधान समृद्धि, समाधान समृद्धि के बिना स्वर्गीयता, स्वर्गीयता के बिना विवेक व विज्ञान पूर्ण अध्ययन, विवेक व विज्ञानपूर्ण अध्ययन के बिना यथार्थ दर्शन का प्रमाण नहीं है ।

“सर्व शुभ हो”

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