• निष्ठा से न्याय, धर्म एवं सत्य के प्रकाश में मानव लक्ष्य के लिये अध्ययन होता है । निष्ठा के फलस्वरूप अनुभूति होता है । अनुभूति मात्र सत्य में है । सहअस्तित्व रुपी परम सत्य में अनुभूति ही जीवन में भ्रम मुक्ति है ।
  • व्यापक सत्ता पारगामी-पारदर्शी रूप में और देवी-देवताएँ अनेक हैं ।
  • ईष्ट :- निर्भ्रमता पूर्वक श्रद्धा, विश्वास सहित श्रेष्ठता का पहचान होना सहअस्तित्व में ईष्ट है ।
  • जागृति रुपी ईष्ट में निष्ठा की निरंतरता से ही अनुभूति है ।
  • जीवन तत्व अमरत्ववादी है, इसीलिये नित्य सत्ता सहज अनुभव करने योग्य योग्यता को प्रमाणित करने का अवसर हर मानव इकाई में है ।
  • दूसरे के अस्तित्व के बिना जिसका अस्तित्व सिद्ध न होता हो उसको सापेक्ष की संज्ञा है ।
  • असंग्रह से निर्बीज प्रवृत्ति का प्रसव है, जिसका फल प्रमाण सर्वतोमुखी समाधान से समझदारी एवं समृद्धि श्रम से प्रकट होता है ।
  • असंग्रह :- व्यय के लिये की गई आय की असंग्रह संज्ञा है तथा इसका सद्व्यय अनिवार्य है । यह स्वधन विधि से सार्थक है ।
  • अकर्तृत्व व अकर्मणात्व के निश्चय से ही असंग्रह होता है ।
  • अकर्तृत्व :- जो नहीं करना चाहिए उसे न करते हुए विधि विहित क्रियाकलापों को अपनाना ही अनावश्यक कार्यों से मुक्ति है । यही अकर्तृत्व हैं । भ्रमवश किये जाने वाले जितने भी क्रियाकलाप हैं, यही बंधन हैं, क्लेश कारी हैं । इसका निराकरण अनुभव सहज जागृति पूर्वक किये जाने वाले सभी क्रियाकलाप समाधान कारी, सुखकारी और शुभकारी होना ही अकर्तृत्व है । यही उपलब्धि और समृद्धि है ।
  • भ्रम से निराकर्षण ही अकर्तृत्व है । अमानवीयता ही हर मानव के लिए अकरणीय है । अकरणीय को न करना ही अकर्तृत्व है ।

निराकर्षण से अकर्तृत्व तथा अचेष्टा से अकर्मण्यता है ।

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