• मानव के लिये अमानवीय नियम ही अन्याय, अन्याय ही अधर्म, अधर्म ही असत्य, असत्य ही अनीश्वरता, अनीश्वरता ही दु:ख, दु:ख ही जीवत्व (अमानवीयता), जीवत्व ही मानव के लिये अनावश्यकीय नियम है । यह जीव चक्र है, जो मानव के लिये कुचक्र है ।
  • सामाजिक स्तर पर सार्वभौमिक सिद्धांत के आविष्कार को नियम की, नियम को व्यवस्था के स्तर पर व्यवस्थापूर्वक व्यवहृत करते हुए न्याय की, न्याय को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परस्पर समाधानित विचार पूर्ण नीति द्वारा व्यवहृत करते समय धर्म की, धर्म को ब्रम्हांड के स्तर पर व्यवहृत करते समय सत्य की, अनंत ब्रम्हांड के स्तर पर व्यवहृत करते समय उसे सहअस्तित्व की, सहअस्तित्व में मानव द्वारा अनुभव की दशा में आनंद की तथा आनंद को व्यक्तिगत जीवन में आचरित करने की जागृत जीवन संज्ञा है जो दया, कृपा और करूणा है ।
  • सुख, संतोष, शांति एवं आनंद, यह सुख की चार अवस्थाएँ हैं ।
  • सुख की चार अवस्थाओं के पोषक नियमों को मानव के लिए आवश्यकीय नियम तथा इनके शोषक नियमों को अनावश्यकीय नियम संज्ञा है, क्योंकि समस्त मानव सुखानुभव की प्रतीक्षा, आशा, प्रयोग एवं प्रयास में रत हैं ।
  • मानवीयतापूर्ण आचरण रूपी विधि की न्याय, समत्ववादी अथवा श्रेयवादी स्वभाव की धर्म, यथार्थता की सत्य, व्यापकता की ईश्वर, पूर्ण सर्वतोमुखी समाधान की आनंद, आवश्यकीय नियमाचरण की जागृत जीवन, निरपेक्ष शक्ति की सत्ता संज्ञा है ।
  • लोकेशानुभव का अवसर आत्मा को, लोकदर्शन का अवसर बुद्धि व चित्त को तथा न्यायोचित व्यवहार का अवसर वृत्ति व मन को है ।
  • संशय व विपर्यय (भ्रम) से मुक्त जो बौद्धिक स्थिति है उसकी पूर्ण समाधान, इच्छापूर्वक किए गए अंतरंग व बहिरंग व्यवहार की आचरण तथा सार्वभौमिक सिद्धांत की नियम संज्ञा है ।
  • अनिश्चयता की संशय एवं अयथार्थता अर्थात् अयथार्थ को यथार्थ मानना की विपर्यय संज्ञा है ।

“सर्व शुभ हो”

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