- ● मानवीय संस्कृति रूप, बल, धन एवं पद अनुभव प्रमाण रुप में प्रस्तुत होता है ।
- ● प्राकृतिक साधन खनिज, वनस्पति तथा मानवेतर जीव के जाति-भेद से हैं ।
- ● मानव चैतन्य वर्ग की विकसित इकाई है, इसीलिये इन्हें प्राकृतिक संपदा के सदुपयोग सुरक्षा करने का अथवा भ्रमवश दुरूपयोग करने का अवसर प्राप्त है । क्योंकि विकसित के द्वारा अविकसित का उपयोग सदुपयोग, प्रयोजन सहज प्रमाणित होना और भ्रमवश दुरूपयोग करने की संभावना रहती है । जिसमें मानव उपयोग, सदुपयोग पूर्वक ही सुखी होता है ।
- ● प्राकृतिक संपदा का सदुपयोग से अथवा दुरूपयोग से ऋतु-संतुलन अथवा असंतुलन सिद्ध होता है ।
- ● हर भूमि पर पाया जाने वाला- ऋतुमान, शीतमान, तापमान और वर्षामान-उस भूमि पर स्थित खनिज एवं वनस्पति के अनुपात पर निर्भर करता है, जिसका निर्णय परीक्षण एवं सर्वेक्षण पूर्वक गणित से सिद्ध होता है ।
- ● सामाजिक संतुलन अथवा असंतुलन स्वधन/परधन, स्वनारी/परनारी तथा दया/ द्वेष-युक्त विचार सहित किये गये व्यवहार से सिद्ध होता है ।
- ⁘ स्वधन :- प्रतिफल, पारितोषिक तथा पुरस्कार के रूप में प्राप्त धन ‘स्वधन’ अन्यथा ‘परधन’ संज्ञा है ।
- ⁘ स्वनारी/स्वपुरुष :- भौगोलिक स्थिति के अनुसार समाज निर्णीत निर्णय के अनुसार ही ‘स्वनारी तथा स्वपुरुष’ संज्ञा है, अन्यथा ‘परनारी/परपुरुष’ संज्ञा है ।
- ⁘ दया :- दूसरों के विकास के लिये यथा-संभव सहायक होना तथा उनके विकास में हस्तक्षेप न करना ही ‘दया’ है । इसके विपरीत में आचरण की ‘द्वेष’ संज्ञा है ।
- ● जन्म-सिद्ध अधिकार, प्रदत्त अधिकार तथा समयोचित अधिकार भेद से मानव कर्त्तव्य पालन के लिये अधिकार प्राप्त करता है ।
- ● जन्म-सिद्ध अधिकार संबंध के अर्थ में, प्रदत्त अधिकार व्यवस्था-गत सीमा के अर्थ में तथा समयोचित अधिकार संपर्क के अर्थ में है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द