- ⁘ प्राणभय :- शरीर के अस्तित्व (जीवन्तता) के विपरीत में जो मृत्यु की कल्पना है, वह ‘प्राणभय’ है ।
- ⁘ पदभय :- एक से अनेक तक पाये जाने वाले अधिकार की ‘पद’ संज्ञा है तथा इसके विरोध में ‘पदभय’ संज्ञा है ।
- ⁘ मानभय :- यश के विपरीत में या विरोध में ‘मानभय’ संज्ञा है ।
- ⁘ धनभय :- धन के विरोध की संभावना अथवा स्थिति को ‘धनभय’ संज्ञा है ।
- ⁘ उपरोक्त वर्णित चारों उपलब्धियाँ अर्थात् प्राण, पद, मान और धन सामयिक हैं, जिन्हें स्थायी समझ लेना ही संकट का कारण है । क्योंकि प्राण का हरण,पद का पतन या वियोग, मान का भंग तथा धन का व्यय, यह नियति क्रम सिद्धियाँ हैं ।
- ● अत: मानव के लिये परम लाभ मानवीयता का उपार्जन ही है, जिससे मानव सुखी होता है ।
“सर्व शुभ हो”