• अनुभव बोध (संकल्प) से इच्छा, इच्छा से विचार, विचार से आशा, आशा से संवेग, संवेग से क्रिया, क्रिया से अध्ययन तथा अध्ययन से बोध होता है । यह इच्छा तथा क्रिया की क्रम-गति है ।
  • संग्रह मात्र धन का ही है, जो प्रतीक मूल्य है ।
  • उत्पादित व संपादित भेद से वस्तुएं हैं ।
  • संपादन :- प्राकृतिक वस्तुओं से उपलब्धि की ‘संपादन’ संज्ञा है ।
  • उत्पादन :- प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम पूर्वक संपादित वस्तु को मनाकार (इच्छानुरूप आकार) प्रदान करना ही ‘उत्पादन’ है ।
  • वस्तु का संग्रह नहीं है, क्योंकि उसका उपयोग व परिणाम निश्चित है (रूपांतरण) ।
  • # स्व-श्रेष्ठता के मान्यता के आधार पर घृणा, दुर्बलता की तुलना में हिंसा तथा दूसरों के विकास के प्रति ईर्ष्या है, जबकि स्व-श्रेष्ठता के अनुरूप असक्षम को समुचित सहयोग देना ही घृणा के स्थान पर उदारता, अपने को पर-विकासानुरूप, जागृति अनुरूप पाने का प्रयास ही स्पर्धा है तथा दुर्बल की रक्षा करना ही दया है ।
  • हिंसात्मक कार्य व्यक्ति, परिवार, समाज, वर्ग, जाति, मत, सम्प्रदाय, भाषा तथा राष्ट्र के स्तर-भेद से है, जो द्वन्द्व एवं प्रतिद्वन्द्व के रूप में परिलक्षित होता है ।
  • हिंसा की प्रतिहिंसा, द्वन्द्व का प्रतिद्वन्द्व, अपराध का प्रतिकार अवश्यम्भावी है । अत: द्वेष कामना किसी भी देश व काल में मानव के जागृति के लिये सहायक नहीं सिद्ध हुई है ।
  • अविद्या अथवा अज्ञान :- जैसा जिसका रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्म है, उसको उसी प्रकार समझने योग्य जागृति के अभाव की ‘अविद्या’ अथवा ‘अज्ञान’ संज्ञा है ।
  • अभिमान :- स्व-बल, बुद्धि, रूप, पद व धन को श्रेष्ठ तथा अन्य को नेष्ट मानने वाली प्रवृत्ति की ‘अभिमान’ संज्ञा है । आरोपित मान ही अभिमान है ।
  • इकाई समष्टि में अंश के रूप में है ।
  • प्राणभय, पदभय, मानभय तथा धनभय यह भय के चार कारण भेद हैं । प्राण, पद, मान तथा धन यह स्थानांतरण तथा परिवर्तन से मुक्त नहीं है ।
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