• भौतिक समृद्धि वैज्ञानिक नियमों के अध्ययन और तदनुसार कर्माभ्यास से ही संभव है तथा बौद्धिक समाधान विवेकपूर्ण नियमों के अध्ययन एवं तदनुसार नियंत्रण से ही संभव है ।
  • स्वस्थ व्यवहार के लिए स्वस्थ शरीर का भी महत्वपूर्ण स्थान है, जो प्राण के विधिवत् नियन्त्रण से ही संभव है ।
  • अन्न से प्राण-पोषण, व्यवसाय से समृद्धि, संयम से अपव्यय का निरोध, वैज्ञानिक समझ से भौतिक दर्शन, विवेकात्मक समझ से बौद्धिक दर्शन, व्यवहारिक समझ से समाज दर्शन, अर्थशास्त्र की समझ से व्यवस्था का दर्शन तथा पूर्ण समाधान से व्यापकता में अनुभूति एवं दर्शन है ।
  • प्राण एक वायु विशेष है, जिससे हृदय क्रिया के लिये प्रेरणा पाता है । वायु एक से अधिक विरल पदार्थों के उत्सव अथवा संघर्ष से उत्पन्न, वेग व तरंग सहित पदार्थ-राशि है । प्राण के पाँच भेद हैं :- (1) प्राण, (2) अपान, (3) व्यान, (4) उदान और (5) समान ।
  • प्राणवायु शरीर व प्राणकोशा के लिये प्रेरणापूर्वक बल-पोषक, अपान वायु अनावश्यक व बल-शोषक, व्यान वायु शरीर के लिये उपयोगात्मक, उदानवायु शरीरके लिये संचालनात्मक तथा समानवायु शरीर के लिये विकासात्मक है । इन पाँचों वायु का संतुलन संबंधित चैतन्य इकाई के विचार, आहार, विहार व व्यवहार की रीति, नीति एवं परिस्थिति पर निर्भर करता है ।
  • अन्न-आहार एवं औषधि के रूप में है ।
  • आहार :- ग्रहण कर लेने योग्य तत्व जिसमें हों, उसकी ‘आहार’ संज्ञा है ।
  • औषधि :- शारीरिक व मानसिक विकृति (रोग) के निराकरण (उपचार) हेतु प्रयुक्त पदार्थ की ‘औषधि’ संज्ञा है ।
  • अन्न :- शारीरिक पोषण एवं परिवर्धन हेतु प्रयुक्त पदार्थ की ‘अन्न’ संज्ञा है ।
  • प्राप्त कर्त्तव्य; वांछित, प्रेरित व सूचित भेद से हैं ।
  • प्राप्त कर्त्तव्य का निश्चयपूर्वक किया गया मनन, चिंतन, विचार, चेष्टा, प्रयोग, प्रयास, व्यवसाय व अनुसंधान क्रिया ही ‘निष्ठा’ है । अन्य शब्दों में निश्चित क्रिया की पूर्णता के लिये पाये जाने वाले वैचारिक व शारीरिक योग की निरंतरता ही निष्ठा है ।
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