• संबंध :- माता-पिता एवं पुत्र-पुत्री, भाई-बहिन, पति-पत्नी, साथी-सहयोगी, गुरु-शिष्य तथा मित्र तथा व्यवस्था संबंध के रूप में है ।
  • प्रदत्त अधिकार :- कुटुंब, समाज तथा व्यवस्था-दत्त भेद से है ।
  • कुटुंब-दत्त अधिकार, कुटुंब में कर्तव्यों-दायित्वों के पालन, चरित्र-संरक्षण, प्राण-पोषण व अर्थोपार्जन के लक्ष्य भेद से है ।
  • समाज-दत्त अधिकार, समाज-दत्त कर्तव्यों के पालन, गरिमापूर्ण व्यक्तित्व एवम् सार्थक शास्त्र प्रचार तथा सिद्धान्तों के शोध के आशय भेद से है ।
  • व्यवस्था-दत्त अधिकार, व्यवस्था-दत्त कर्तव्यों का पालन, शास्त्र सिद्धांतों का कुशलता, निपुणता, पाण्डित्य पूर्वक अध्ययन, व्यवहार व कर्माभ्यास में परिपूर्णता और अधिकार पूर्ण व्यक्तित्व पर निर्भर करता है, जिससे सफलता है, अन्यथा में असफलता है ।
  • समयोचित अधिकार समय व समीचीन मिलन के अनुसार व्यवहार में संपन्न होता है ।
  • मानव मात्र में सुख की आशा अपरिवर्तनीय है, जिसकी अपेक्षा में ही चेतना विकास मूल्य शिक्षा से विधि व निषेध स्वीकार होता है ।
  • सुख एवं दु:ख वैयक्तिक, कौटुंबिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार-नीति पर ही आधारित है ।
  • मानव में व्यवहार नीति के निर्वाह के लिये छ: दृष्टियाँ पूर्व में वर्णित की गई हैं, जिनमें से मानवीय दृष्टि सम्पन्न व्यवहार से ही एक से अनेक तक सुखी है ।
  • भ्रमित मानव कर्म करते समय स्वतंत्र और फल भोगते समय परतंत्र होने के कारण ही अमानवीय दृष्टि से भय व प्रलोभन पूर्वक व्यवहार कार्य करता है, फलत: दु:ख भोगता है और स्वयं के जागृति को अवरुद्ध करता है ।
  • मानव इस सृष्टि में सर्वोच्च विकसित, जागृतिशील व जागृत रूप में प्रमाणित होने योग्य इकाई है । इसीलिये मानव में तीनों इतर सृष्टि यथा पदार्थावस्था, प्राणावस्था एवं जीवावस्था के गुण, स्वभाव एवं धर्म समाविष्ट रहते ही हैं ।
  • मानव ने बौद्धिक समाधान तथा भौतिक समृद्धि द्वारा सुखी होने की कामना की है ।
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