- ⁘ रचना :- पदार्थ की अवधि की ‘रचना या वस्तु’ संज्ञा है, जिसकी गणना की जाती है।
- ⁘ विस्तार :- रचना की अवधि की ‘विस्तार’संज्ञा है ।
- ⁘ सम :- उद्भववादी गुणों की ‘सम’ संज्ञा है ।
- ⁘ विषम :- प्रलयवादी गुणों की ‘विषम’ संज्ञा है ।
- ⁘ मध्यस्थ :- विभववादी गुणों की ‘मध्यस्थ’ संज्ञा है ।
- # सम, विषम तथा मध्यस्थ गुणों को ही क्रमश: रजोगुण, तमोगुण तथा सतोगुण संज्ञा से भी जाना जाता है ।
- ● संपूर्ण परमाणुओं में पाई जाने वाली क्रिया के लिए प्राप्त ऊर्जा रूपी सत्ता की निरपेक्ष कारण संज्ञा है । निरपेक्ष सत्ता का तात्पर्य जिसका उत्पत्ति क्रम का कारण न हो और नित्य स्थिति में हो ।
- ● परमाणु-व्यूहों में सहवास से जो प्रभाव-विशेष है, क्रिया, प्रतिक्रिया एवं परिपाक है उसे ‘सापेक्ष कारण’ संज्ञा है ।
- ● अनेक अणु-परमाणुओं से संगठित पिण्ड व उनकी क्रिया को ‘स्थूल-क्रिया’ और परमाण्विक क्रिया को ‘सूक्ष्म-क्रिया’ संज्ञा है ।
- ● गति, कंपन और तरंग भेद से सूक्ष्म गतियाँ तथा क्रि याएँ हैं ।
- ● इकाई में कंपन क्रिया का बढ़ जाना ही विकास की घटना है, तथा इसके विपरीत में ह्रास की घटना है ।
- ● चैतन्य इकाई में कम्पन की अधिकता ही विशेषता है ।
- ● ज्ञान में पारदर्शकता के अंशानुसार चैतन्य इकाई भ्रांत, भ्रांताभ्रान्त तथा निर्भ्रान्त स्थिति में है ।
- ● जड़ता में पारदर्शकता से अंधकार का अभाव, पारभासिकता से अंधकार का आंशिकता में अभाव तथा अपारदर्शकता से अंधकार है । अंधकार मूलतः छाया ही है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द