- ● मानव कोटि तक ऐसी कोई इकाई नहीं है, जो किसी का आशय न हो, अथवा जो किसी का आश्रित न हो, इसीलिए समस्त क्रिया मात्र अन्योन्याश्रित सिद्ध है । मात्र विचार ही सत्यपूर्ण होने पर स्वतंत्र है, अन्यथा वह भी आसक्ति ही है । स्वतंत्र विचार परस्पर पूरक और उपयोगी सिद्ध है ही ।
- ● मानव में परस्पर पूरकता व उपयोगिता व्यवहार की एकसूत्रता है । एकसूत्रता से सफलता की ओर अन्यथा असफलता की ओर गति है ।
- ● सहअस्तित्व में विरोध नहीं, एकसूत्रता है । अत: सहअस्तित्व मानव जीवन में व्यवहार का लक्ष्य सिद्ध हुआ ।
- ● धर्मपूर्ण विचार तथा न्यायपूर्ण व्यवहार से ही सत्य में अनुभूति होना संभव होती है ।
- ● उन्नति के लिए जो प्रवृत्ति एवं प्रयास है, उसे ‘स्पर्धा’ तथा इसके विरोध में प्राप्त प्रयास व प्रवृत्ति की ‘ईर्ष्या’ संज्ञा है । स्पर्धा से हर्ष एवं उत्साह व द्वेष तथा ईर्ष्या से अमर्ष का प्रसव होता है ।
- ● स्वयं में पूर्ण होने के लिए मानव परंपरा में जिज्ञासा और निष्ठा उदय होने की स्थिति में सभी ईर्ष्या, द्वेष शमन होने लगते हैं । जागृत होने पर ईर्ष्या, द्वेष आदि समस्त भ्रमों से मुक्ति हो जाती है ।
- ● संग्रह से लोभ, द्वेष से विरोध, अविद्या से अज्ञान, अभिमान से उद्दण्डता और भय से आतंक का जन्म होता है, जो वैचारिक क्लेश हैं ।
- ⁘ द्वेष :- दूसरों के नाश में ही स्व-सुख की कल्पना करना ‘द्वेष’ है ।
- ● जो स्वयं क्लेशित रहेगा, वह दूसरों को क्लेश पहुँचायेगा ही, क्योंकि यह नियम है कि जिसके पास जो होगा, वह उसे बाँटेगा ही ।
- ● उपरोक्त पाँच अपरिमार्जित प्रवृत्तियों के समाधान के रूप में पाँच परिमार्जित मूल प्रवृत्तियाँ भी हैं, जो असंग्रह (समृद्धि), स्नेह, विद्या, सरलता तथा अभय हैं । इन प्रवृत्तियों से उत्पन्न संपूर्ण संवेग और प्रवृत्ति क्रमश: उदारता, निर्विरोध, यथार्थ ज्ञान, सहअस्तित्व तथा धैर्य उद्गमित होता है, जिससे हर्ष, प्रसन्नता, उत्साह, तृप्ति, उल्लास तथा आह्लाद की निरंतरता बनी रहती है, जिसकी अनवरत प्रतीक्षा में मानव है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द