- ⁘ आनंदमय कोष :- सुख अथवा दु:ख को व्यक्त करने वाले अंग की आनंदमय कोष संज्ञा है ।
- ⁘ विज्ञानमय कोष :- विशेष ज्ञान को ग्रहण करने वाले अंग की विज्ञानमय कोष संज्ञा है ।
- ● कोष-प्रकाशन भेद से सृष्टि में अवस्था भेद पाया जाता है ।
- ⁕ पदार्थावस्था की सृष्टि में अन्नमय कोष और प्राणमय कोष का प्रकाशन है । इन दो कोषों की क्रियाएँ समस्त पदार्थावस्था के मूल रूप परमाणुओं में पाई जाती है । प्रत्येक परमाणु सचेष्ट है, इसलिए उसमें प्रेरणा पाने वाला अंग सिद्ध है, इसके साथ ही परमाणु ह्रास एवं विकास से मुक्त नहीं है, जो कि ग्रहण विसर्जन का ही प्रतिफल है । अत: पदार्थ में अन्नमय कोष भी सिद्ध हुआ । अन्नमय कोष की क्रियाशीलता भी चेष्टा का ही फल है अर्थात् प्राणमय कोष के चेष्टित होने का फल ही है कि अन्नमय कोष की क्रिया भी संपादित होती है । अत: यह सिद्ध हुआ कि अन्नमय कोष और प्राणमय कोष का अविभाज्य संबंध है ।
- ⁕ प्राणावस्था की सृष्टि में तीन कोषों का प्रकाशन है, यह है - अन्नमय कोष, प्राणमय कोष और मनोमय कोष । वनस्पतियों में पदार्थावस्था की सृष्टि की अपेक्षा चयनवादी क्रिया विशेष है, जो मनोमय-कोष की क्रिया है । यह इससे स्पष्ट होता है कि एक ही भूमि पर स्थित विभिन्न वनस्पतियाँ अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार आवश्यकीय तत्वों एवं रसों को ग्रहण करते हुए पुष्ट होती देखी जाती हैं ।
- ⁕ जीवावस्था व भ्रमित ज्ञानावस्था में चार कोषों की क्रिया स्पष्ट है । यह है - अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष और आनंदमय कोष ।
- # आनंदमय कोष का विकास ही चैतन्यता का कारण है तथा इसी चैतन्यता के कारण जीवावस्था में सुख और दु:ख का प्रकाशन है । इसके कारण ही जीवावस्था की इकाई को विषयों (आहार, निद्रा, भय और मैथुन) का सेवन करने का अधिकार है ।
- # जागृत मानव में पाँच कोषों का प्रकाशन है, इन पाँचों कोषों की क्रियाशीलता व अभिव्यक्ति मानव में है । यह अन्नमय कोष, प्राणमय कोष, मनोमय कोष, आनंदमय कोष और विज्ञानमय कोष है ।
Table of contents
Jump to any page
-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द