- ● भार, आकर्षण से; आकर्षण, परस्परता से; परस्परता, लघुता एवं गुरुता से; लघुत्व एवं गुरुत्व, रचना एवं सापेक्ष ऊर्जाओं से; रचना एवं सापेक्ष ऊर्जा, क्रिया से; क्रिया, पदार्थ से और पदार्थ का ह्रास एवं विकास सापेक्ष ऊर्जा के सदुपयोग एवं दुरूपयोग से सापेक्षित है।
- ● समस्त पदार्थ निरपेक्ष ऊर्जा में संपृक्त व समाहित हैं तथा संपूर्ण सृष्टि की स्थिति तथा गति निरपेक्ष ऊर्जा में है ।
- ● प्रत्येक चेष्टा से सापेक्ष ऊर्जा का प्रसव है ।
- ● मूल चेष्टा के लिए निरपेक्ष ऊर्जा सबको प्राप्त है ही ।
- ⁘ मूल चेष्टा :- पदार्थ के परमाण्विक स्थिति में वातावरण के दबाव से मुक्त चेष्टा की मूल चेष्टा संज्ञा है ।
- ⁕ किसी भी भूमि पर पूर्ण सृष्टि तभी संभव है जब वह अपने में आवश्यक संपूर्ण रस, उपरस एवं वायु से समृद्ध हो जाये । इस प्रकार से इस असीम अवकाश में अनंत भूमि अपनी प्रगति के अनुसार पूर्ण-विकसित, अर्धविकसित, अल्प विकसित एवं अविकसित अवस्था में हैं । रस, उपरस का प्रमाण रासायनिक क्रियाकलाप और वैभव के रूप में है ।
- ⁕ अविकसित सृष्टि पदार्थावस्था की सृष्टि है । समस्त मृद्, पाषाण, मणि एवं धातु की गणना अविकसित सृष्टि में है । अल्प-विकसित सृष्टि प्राणावस्था की सृष्टि है । समस्त वनस्पति प्राणावस्था की सृष्टि में सम्मिलित हैं । अर्ध-विकसित सृष्टि जो जीवावस्था की सृष्टि है । मानवेतर अण्डज और पिण्डज सृष्टि की गणना जीवावस्था में है । ज्ञानावस्था में शरीर रचना पूर्ण-विकसित सृष्टि है । यह स्पष्ट हो जाना आवश्यक है कि अल्प-विकसित सृष्टि में अविकसित सृष्टि; अर्ध-विकसित सृष्टि में अल्प-विकसित और अविकसित तथा पूर्ण-विकसित सृष्टि में अर्ध विकसित, अल्प-विकसित तथा अविकसित सृष्टि समाहित है ही क्योंकि गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया रहता है ।
- ⁕ फलतः उच्चकोटि की सृष्टि में निम्न कोटि की सृष्टि के गुण, स्वभाव और धर्म विलय रहते ही हैं ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द