• क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के अनुसार ही चैतन्य इकाई ने मानवीयता, अतिमानवीयता और अमानवीयता का उद्घाटन किया है ।
  • मानव की क्षमता भेद से क्रम से बोध, दर्शन, कल्पना, आशा, अवस्था, प्रयास, प्रभाव और मानव की क्षमता का द्योतक है ।
  • पदार्थ, मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा का नाश नहीं है या अभाव नहीं है । इनमें मात्र विकास और जागृति का ही न्यूनाधिक्य है ।
  • पदार्थ परिणामवादी, प्राण तरंगवादी, मन चयनवादी, वृत्ति तुलनवादी, चित्त चित्रणवादी, बुद्धि बोधवादी तथा आत्मा अस्तित्ववादी तत्व है ।
  • आत्मा तीनों कालों में मध्यस्थ क्रिया के रूप में एक सा विद्यमान है । अस्तित्व अपरिवर्तनीय है । इसका आत्मा में अनुभव, बुद्धि में बोध होता है ।
  • स्वस्वरूप तथा परस्वरूप बोध बुद्धि में, पूर्ण अपूर्ण चित्रण भेद चित्त में, सत्यासत्य, धर्माधर्म, न्यायान्याय, लाभालाभ, हिताहित, प्रियाप्रिय भेद वृति व प्रवृति में पूर्वानुक्रम या परानुक्रम भेद मन में तथा उसकी चयन क्रियाएं है ।
  • वृत्ति, चित्त, बुद्धि व आत्मा के अनुकूल प्रेरणा की ‘पूर्वानुक्रम’ तथा प्राण, हृदय, शरीर और उसके व्यवहार, व्यवसाय के अनुकूल विवशता या दबाव की परानुक्रम संज्ञा है ।
  • भौतिक, रासायनिक वस्तु व सेवा में आसक्ति से संग्रह, लोभ व कामुकता; प्राण तत्व में आसक्ति से द्वेष, मोह, मद, क्रोध, दर्प; जीवत्व (जीने की आशा) में आसक्ति से अभिमान, अज्ञान, ईर्ष्या और मत्सर यह अजागृत मानव की प्रवृत्तियाँ है । सत्य के प्रति निष्ठा से कर्त्तव्य में दृढ़ता, असंग्रह, सरलता तथा अभयता व प्रेमपूर्ण मूल प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं।
  • पूर्ण बोध का अवसर इस भूमि पर केवल मानव को ही है, अन्य किसी इकाई को नहीं । इसलिए मानव उसके बिना सुखी नहीं हुआ है । स्वस्वरूप (आत्म) बोध को पूर्ण बोध संज्ञा है ।
  • पूर्ण बोध - अस्तित्व दर्शन बोध, जीवन ज्ञान बोध, मानवीयतापूर्ण आचरण बोध ।
  • अपूर्ण बोध - सहअस्तित्व में अनुभव प्रमाण बोध होने के पहले अपूर्ण बोध ।
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