प्रभाव तथा अज्ञान रहित बुद्धि के लिये अर्न्तनियामन का प्रभाव आवश्यक सिद्ध होता है ।
- ⁕ अतः परस्परता में जो व्यतिरेक है उसके उन्मूलन के लिये तथा परस्परता में विश्वास को उत्पन्न करने के लिये, जो जागृति के लिये प्रथम सोपान है, मानवीयतापूर्ण आचरण व सामाजिकता, न्यायपूर्ण व्यवस्था, सहअस्तित्व रूपी सत्य प्रतिष्ठित शिक्षा एवम् इसमें विश्वासपूर्वक व्यक्तिगत निष्ठा उत्पन्न करना सबका सम्मिलित दायित्व सिद्ध होता है ।
- # ह्रास एवं विकास का जो क्रम है, वह आवर्तनशीलता के आधार पर सिद्ध होता है । प्रत्येक मानव जागृति ही चाहता है, किन्तु भ्रमवश ह्रास को प्राप्त करता है । इसका कारण मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि और आत्मा के बीच आवर्तन एवं प्रत्यावर्तन क्रिया एवं उसके प्रभाव का ज्ञान न होना ही है, जो रहस्यता के रूप में मानव मन को उद्वेलित किए रहता है ।
- ● भ्रान्त अवस्था में प्रधानतः छः प्रकार के आवेशों को पाया जाता है, वे हैं 1. काम, 2. क्रोध, 3. मद, 4. मोह, 5. लोभ और 6. मत्सर ।
- ● इन सबके मूल में आवेश है । आवेश ही मानव के लिए दुःख का कारण है ।
- ● आवेश के मूल में हठ, हठ के मूल में भ्रम और भ्रम के मूल में अहंकार है ।
- ⁘ हठ :- अपने विचार या व्यवहार से पूर्णतः प्रभावित हो जाना हठ है ।
- ⁘ काम :- प्रजनन या यौन संवेदना क्रिया में सुख पाने की प्रवृत्ति की काम संज्ञा है ।
- ⁘ क्रोध :- स्वयम् की अक्षमता का प्रदर्शन ही क्रोध है ।
- ⁘ मद :- असत्यता के प्रति मान्यता की पराकाष्ठा ही मद है ।
- ⁘ मोह :- मुग्ध हो जाना ही मोह है ।
- ⁘ लोभ :- पात्रता से अधिक विशेष विभूति के प्रति उत्कट वांछा एवम् प्रयास ही लोभ है । सुविधा-संग्रह प्रवृत्ति होना ।
- ⁘ मत्सर :- दूसरे के ह्रास एवम् पतन हेतु उत्कट कामना व प्रयास मत्सर है ।