• व्याकुल :- वाँछित की पीड़ा से भर जाना ।
  • उद्विग्न :- वाँछित क्रिया में अप्रत्याशित गति ।
  • आवेश :- अतिक्रमण या आक्रमण से प्राप्त दबाव ही आवेश है ।
  • विधिवत् आचरण :- धर्मनीति एवं राज्यनीति सम्मत व्यवहार ।
  • आस्वादन एवं अनुभूति के लिए ही मानव द्वारा विभिन्न सभी पक्षों का अनुसंधान, संधान, प्रयोग व व्यवसाय, अभ्यास तथा आविष्कार किया गया है ।
  • आस्वादन :- जो जिसमें नहीं हो या कम हो और उसे पाने की इच्छा हो, ऐसी स्थिति में उसकी उपलब्धि से प्राप्त प्रभावपूर्ण क्रिया की, जिसमें तृप्ति या तृप्ति की प्रत्याशा अवश्य हो, ‘आस्वादन’ संज्ञा है ।
  • कामना-जन्य क्षुधा तथा तृषा, राग द्वेषात्मक आवेशजन्य काम और क्रोध, मन आशित चार विषय तथा लोभ यह भ्रमित मानव की विवशताएँ हैं । जागृत विचारों से पोषित व्यवहार एवं तीन ऐषणाएँ, चिंतन से प्रस्तुत कला एवं साहित्य, बोधपूर्वक प्रस्तुत तात्विकता तथा समाधान, जागृत मानव के द्वारा उद्घाटित हुआ है ।
  • संसार के समस्त क्रियाकलाप व्यापक सत्ता की अनुभूति, विकसित के सान्निध्य और अविकसित के आस्वादन के लिये है ।
  • सहअस्तित्व में अनुभव ही सर्वमानव का ईष्ट है । अनुभव के फलन में सहअस्तित्व में तद्रूपता, तादात्म्यता होना स्वाभाविक है । ऐसे तादात्म्य मानवत्व संपन्न मानव ही देव मानव, दिव्य मानव कोटि में होते हैं । ऐसे मानव के तत्सान्निध्य एवं तदावलोकन होना जागृत मानव परंपरा में भावी है । इससे स्पष्ट हुआ कि चरम विकास और जागृति व अभिव्यक्ति प्रमाण सदा-सदा मानव परंपरा में होना ही सौभाग्य है ।
  • भ्रमित मानव जागृति क्रम से जब जागृत होता है, तब जागृति ईष्ट होने के आधार पर जो भ्रमात्मक गुण स्वभाव रहा है वह शनै: शनै: विलय हो जाता है । फलत: जागृति में तद्रूपता को जीवन प्रमाणित करता है । जो मानव परंपरा में प्रमाणित होता है । भ्रमित अवस्था में अधिमूल्यन, अवमूल्यन, निर्मूल्यन को मूल्य माने रहते हैं, वह पूर्णतया जागृत होकर, जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य और उपयोगिता व कला (सुंदरता)
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