• मध्यस्थ क्रिया (आत्मा) का अध्ययन अनुसंधानपूर्वक प्रस्तुत मध्यस्थ दर्शन का शोधपूर्वक अध्ययन अनुसरण ही एकसूत्रता है । एकसूत्रता न्याय, धर्म तथा सत्यतापूर्ण व्यवहार, विचार एवं अनुभूति ही है ।
  • मानव को विचार के अभाव में किसी भी सम-विषमात्मक क्रिया सम्भावना नहीं है ।
  • सत्य पहले से ही प्राप्त सत्ता है, जिसकी उपस्थिति जागृति के पूर्व भी पाई जाती है और अन्तिम ह्रास भी इसमें ही अवस्थित है । इसी के आनुषंगिक जो अनुभूति है, उसे ‘पूर्वानुक्रम’ की संज्ञा है । ऐसी अनुभूति में ही मानव ने समाधान एवम् आनन्द की निरंतरता का अनुभव किया है ।
  • मानव में तीनों ऐषणाएं, मानवीय विषय-प्रवृत्ति के रूप में स्पष्ट हुआ रहता है, दृष्टि न्याय प्रधान, धर्म व सत्य सम्मत रहती है । इनका स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता के रूप में पहचाना गया है । ऐसे विषय, प्रवृत्ति, स्वभाव व दृष्टि संपन्न मानव को जागृत मानव के रूप में पहचाना गया है । इन्हें सर्वतोमुखी समाधान ज्ञान हुआ ही रहता है । उसे क्रियान्वयन करने की स्थिति में ऐषणाएं विशेषकर पुत्रेषणा, वित्तेषणा सीमित क्षेत्रों में व्यक्त करने के लिए व्यस्त रहते हैं । इस विधा में मानव उपयोगी, सदुपयोगी होते हुए, प्रयोजन पूर्ण होने में अपेक्षा बनी रहती है । इसलिए देवमानव, दिव्यमानव के रूप में व्यक्त होना, प्रमाणित होना आवश्यकता के रूप में होना पाया जाता है ।
  • पूर्वानुक्रम अनुभूति में, निहित क्रिया के रूप में, विकसित का संकेत ग्रहण करना है, जिससे विकास की ओर प्रवृत्ति, प्रयास एवम् उद्देश्य का रहना परम आवश्यक है ।
  • हर मानव जागृतिशील है अथवा जागृत होना चाहता है । हर मानव योग पूर्वक ही जागृत होता है । जागृति के लिए ही वह आतुर, कातुर, आकुल, व्याकुल, आवेशित अथवा उद्विग्न रहता है ।
  • आतुर :- पात्रता से अधिक इच्छा प्रगट करने का प्रयास ।
  • कातुर :- वाँछित इच्छा पूर्ति के लिए शीघ्रता से कार्यरत होना जिसमें कुशलता, निपुणता और पाण्डित्य का अभाव हो ।
  • आकुल :- वाँछित के अभाव की पीड़ा का अनुभव ।
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