- ● मध्यस्थ क्रिया (आत्मा) का अध्ययन अनुसंधानपूर्वक प्रस्तुत मध्यस्थ दर्शन का शोधपूर्वक अध्ययन अनुसरण ही एकसूत्रता है । एकसूत्रता न्याय, धर्म तथा सत्यतापूर्ण व्यवहार, विचार एवं अनुभूति ही है ।
- ● मानव को विचार के अभाव में किसी भी सम-विषमात्मक क्रिया सम्भावना नहीं है ।
- ● सत्य पहले से ही प्राप्त सत्ता है, जिसकी उपस्थिति जागृति के पूर्व भी पाई जाती है और अन्तिम ह्रास भी इसमें ही अवस्थित है । इसी के आनुषंगिक जो अनुभूति है, उसे ‘पूर्वानुक्रम’ की संज्ञा है । ऐसी अनुभूति में ही मानव ने समाधान एवम् आनन्द की निरंतरता का अनुभव किया है ।
- ● मानव में तीनों ऐषणाएं, मानवीय विषय-प्रवृत्ति के रूप में स्पष्ट हुआ रहता है, दृष्टि न्याय प्रधान, धर्म व सत्य सम्मत रहती है । इनका स्वभाव धीरता, वीरता, उदारता के रूप में पहचाना गया है । ऐसे विषय, प्रवृत्ति, स्वभाव व दृष्टि संपन्न मानव को जागृत मानव के रूप में पहचाना गया है । इन्हें सर्वतोमुखी समाधान ज्ञान हुआ ही रहता है । उसे क्रियान्वयन करने की स्थिति में ऐषणाएं विशेषकर पुत्रेषणा, वित्तेषणा सीमित क्षेत्रों में व्यक्त करने के लिए व्यस्त रहते हैं । इस विधा में मानव उपयोगी, सदुपयोगी होते हुए, प्रयोजन पूर्ण होने में अपेक्षा बनी रहती है । इसलिए देवमानव, दिव्यमानव के रूप में व्यक्त होना, प्रमाणित होना आवश्यकता के रूप में होना पाया जाता है ।
- ● पूर्वानुक्रम अनुभूति में, निहित क्रिया के रूप में, विकसित का संकेत ग्रहण करना है, जिससे विकास की ओर प्रवृत्ति, प्रयास एवम् उद्देश्य का रहना परम आवश्यक है ।
- ● हर मानव जागृतिशील है अथवा जागृत होना चाहता है । हर मानव योग पूर्वक ही जागृत होता है । जागृति के लिए ही वह आतुर, कातुर, आकुल, व्याकुल, आवेशित अथवा उद्विग्न रहता है ।
- ⁘ आतुर :- पात्रता से अधिक इच्छा प्रगट करने का प्रयास ।
- ⁘ कातुर :- वाँछित इच्छा पूर्ति के लिए शीघ्रता से कार्यरत होना जिसमें कुशलता, निपुणता और पाण्डित्य का अभाव हो ।
- ⁘ आकुल :- वाँछित के अभाव की पीड़ा का अनुभव ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द