• मन में आवेश, वृत्ति में हठ, चित्त में भ्रम तथा बुद्धि में आत्मा से विमुखता (अहंकार) ही शरीर मूलक प्रवृत्तियाँ है, और मन में मित्र-आशा, वृत्ति में विचार, चित्त में इच्छा और बुद्धि में ऋतम्भरा, आत्मा में अनुभव प्रमाण परावर्तन क्रिया है ।
  • मन एवम् वृत्ति के मध्य में भ्रमित मनःकृत वातावरण के दबाव से दुःख तथा इसके विपरीत वृत्ति एवम् मन के मध्य में वृत्ति सहज वातावरण के प्रभाव से सुख की उपलब्धि होती है।
  • वृत्ति एवम् चित्त के मध्य में वृत्ति कृत वातावरण के दबाव से अशांति तथा इसके विपरीत चित्त एवम् वृत्ति के मध्य में चित्त सहज वातावरण के प्रभाव से शान्ति की उपलब्धि होती है ।
  • चित्त एवम् बुद्धि के मध्य में चित्त कृत वातावरण से असंतोष तथा इसके विपरीत बुद्धि एवम् चित्त के मध्य बुद्धि सहज वातावरण से संतोष की उपलब्धि होती है ।
  • बुद्धि एवम् आत्मा के मध्य में आत्मा का ही वातावरण होना पाया जाता है क्योंकि आत्मा मध्यस्थ है । यह वातावरण प्रभावपूर्ण रहता है तथा आत्माभिमुख बुद्धि सहअस्तित्व में अनुभव सहज आनन्द की अनुभूति रहना पाया जाता है ।
  • # इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि जागृत जीवन में मन और वृत्ति के योग से सुख, वृत्ति और चित्त के योग से शान्ति, चित्त व बुद्धि के योग से संतोष तथा बुद्धि और आत्मा के योग से आनन्द की अनुभूति होती है । यही जागृति है ।
  • जागृत जीवन में आवर्तन क्रिया में आत्मसत्ता का बुद्धि में, बुद्धि सत्ता का चित्त में, चित्त सत्ता का वृत्ति में तथा वृत्ति सत्ता का मन में पूर्णतः अवगाहन होता है । चूंकि मन से वृत्ति, वृत्ति से चित्त, चित्त से बुद्धि और बुद्धि से आत्मा श्रेष्ठ है, जो जागृति मूलक आवर्तन क्रम के अनुसार आनन्द, संतोष, शान्ति और सुख के रूप में प्रमाणित होता है ।
  • बुद्धि के लिए आत्मानुभूति तथा व्यापकता का बोध, चित्त के लिए सत्यबोध पूर्ण बुद्धि का चिंतन, वृति के लिए यथार्थ चिन्तनपूर्ण चित्त का विचार और मन के लिए न्यायपूर्ण विचारों का मनन ही पूर्ण विकास है जो प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के द्वारा देव मनुष्य तथा दिव्य मनुष्य का जीवन सिद्ध होता है ।
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