- ● मध्यस्थ व्यवहार :- न्यायपूर्ण व्यवहार ।
- ● मध्यस्थ विचार :- धर्मपूर्ण विचार ।
- ● मध्यस्थ अनुभव :- सहअस्तित्व रूपी परम सत्य ।
- ● न्यायपूर्ण व्यवहार ही मानवीयतापूर्ण व्यवहार है । मानवीयता पूर्ण व्यवहार से तात्पर्य है मानवीयता के प्रति निर्विरोधपूर्ण व्यवहार जिसको समझना व समझाना अखंड मानव समाज की दृष्टि से आवश्यक है । इसके लिए अध्ययन व शिक्षा आवश्यक है ।
- ● शिक्षण एवं प्रशिक्षण द्वारा केवल व्यवसाय का ज्ञान कराया जाता है यह मात्र भौतिक समृद्धि के लिये सहायक हुआ है ।
- ● मानवीयता और अतिमानवीयता का वर्गीकरण एवं पुष्टि मानव के साथ किए गये व्यवहार से ही सिद्ध हुई है, जिसके लिए अध्ययन तथा दीक्षा आवश्यक है ।
- ⁘ दीक्षा अनुभवमूलक विधि से :- सुनिश्चित व्यवहार पद्धति व आचरण पद्धति बोध की ‘दीक्षा’ संज्ञा है, जो व्रत है, जिसकी विश्रृंखलता नहीं है, अथवा जिसमें अवरोध नहीं है ।
- ● मानव के आहार, विहार, व्यवहार व व्यवस्था में भागीदारी से ही उसके व्यक्तित्व का मूल्यांकन होता है ।
- ⁘ व्यक्तित्व :- स्वयं में निहित प्रतिभा-प्रसारण के क्रम में सहायक आहार, विहार व व्यवहार की ‘व्यक्तित्व’ संज्ञा है ।
- # व्यवहार का ईष्ट-अनिष्ट, उत्थान-पतन, विकास-ह्रास, उचित-अनुचित, लाभ-हानि, न्याय-अन्याय, पुण्य-पाप, विधि-निषेध, कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य, समाधान-समस्या, आवश्यक-अनावश्यक, भेद-प्रभेद से तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चैतन्य पक्ष की प्रतिभा का ही मूल्यांकन है, क्योंकि चैतन्य इकाई द्वारा ही जड़ पक्ष का चालन, संचालन, प्रतिचालन, परिपालन, परिपोषण, मूल्यांकन, परिवर्धन व परिवर्तन की क्रिया का संपादन हुआ है, जो उसी की इच्छा व विचार का पूर्व रूप है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द