- ⁘ परिवर्धन :- जीवन के क्रियाकलाप में जागृति के लिए सहयोग ।
- ⁘ चित्त-परिवर्तन :- मनाकार में उन्नतोचित्त स्फूर्त होना ।
- ● खनिज, वनस्पति एवं जीव का उपयोग एवं सदुपयोग प्राकृतिक एवं वैकृतिक भेद से मानव करता है ।
- ⁘ वैकृतिक :- उपयोगिता के अर्थ में मनाकार को साकार करना ।
- ● संवेदन, संवहन, संरक्षण, संबोधन, संवर्तन तथा प्रत्यावर्तन क्रिया चैतन्य पक्ष की विशिष्टता है, जो जड़ में नहीं पायी जाती ।
- ⁘ संवेदना :- पाँचों ज्ञानेंद्रियों व कर्मेंद्रियों का ज्ञान अथवा विकास के प्रति प्रवृत्ति ।
- ⁘ संवहन :- पूर्णता के अर्थ में जिज्ञासाओं का वहन । अथवा पूर्णता के अर्थ में वहनशीलता ।
- ⁘ संरक्षण :- विकास के लिए मार्ग प्रशस्त करना ।
- ⁘ संबोधन :- यथार्थ-बोधन ।
- ⁘ संवर्तन :- परिमार्जन एवं परिपूर्णता के लिये प्राप्त संकेत के अनुसरण क्रिया की सम्वर्तन संज्ञा है ।
- ⁘ प्रत्यावर्तन :- जागृति सहज गतिशीलता ।
- ● मानव जागृति क्रम एवं जागृति के अनुसार पशु मानव, राक्षस मानव, मानव, देव मानव, दिव्य मानव के रूप में दृष्टिगत होता है ।
- ⁕ मानव, देव मानव, दिव्य मानव रूप में जागृति परंपरा है ।
- ● मानव जागृति में चैतन्य पक्ष का संस्कार और शरीर और जीवन के संयुक्त रूप में संस्कृति एवं सभ्यता में ही गण्य है । यह मानव परंपरा में प्रमाणित होता है ।
- ⁘ संस्कृति :- पूर्णता के अर्थ में कार्य-व्यवहार । क्रियापूर्णता एवं आचरण पूर्णता के अर्थ में किया गया कृतियाँ ।
:- अखंड समाज के अर्थ में कृतियाँ ।