मूल्य को पहचानना बन जाता है । यही तादात्म्यता का प्रमाण है । यही तत्सान्निध्यता है । सहअस्तित्व नित्य सान्निध्य है । जागृति की निरंतरता ही तदावलोकन है । जागृति में तादात्म्यता ही भ्रम का समापन है । भ्रम का समापन का तात्पर्य जागृति के उपरांत अपने-आप भ्रम का पूर्णतया प्रभाव शून्य हो जाने से है ।

  • ईष्ट के गुण, स्वभाव, धर्म से पूर्णतया प्रभावित हो जाना ही तद्रूपता है । स्वमूल्य का ईष्ट के मूल्य में विलीनीकरण ही तादात्मयता है । ईष्ट का आश्रय भाव ही तत्सान्निध्य है । ईष्ट का दर्शन मिलते रहना ही तदावलोकन है । जागृति ही मानव का ईष्ट है । तद्रूपता, तादात्मयता, तत्सान्निध्यता एवं तदावलोकन ही विकसित की अनुभूति का अंतिम लक्ष्य एवं उपलब्धि है ।
  • जागृति पूर्वक ही मानव में प्रमाण सहित मूल्यों की अभिव्यक्ति, संप्रेषणा, प्रकाशन होता है और इसकी निरंतरता मानव परंपरा में बना ही रहता है । यही प्रेम व भक्ति है ।
  • दया, कृपा, करुणा की संयुक्त अभिव्यक्ति ही प्रेम है । जिसका हर जागृत मानव में, से प्रमाणित होना स्वाभाविक है । यह तदावलोकन में पायी जाने वाली शीर्ष कोटि की उपलब्धि व अनुभूति है ।
  • व्यापकता में अनुभूति से प्राप्त आप्लावन से (प्रभाव व प्रवाह) बुद्धि, चित्त, वृत्ति एवं मन पर्यन्त प्रभावशील है । इस आप्लावन को बुद्धि के स्तर पर आनंद, चित्त के स्तर पर संतोष, वृत्ति के स्तर पर शांति तथा मन के स्तर पर सुख संज्ञा है । यह अनुभूति ही इकाई का चरमोत्कर्ष है ।
  • सहअस्तित्व में अनुभूति आत्मा करती है, तभी बुद्धि का प्रत्यावर्तन संभव होता है ।
  • मन का प्रत्यावर्तन वृत्ति में, वृत्ति का प्रत्यावर्तन चित्त में, चित्त का प्रत्यावर्तन बुद्धि में, बुद्धि का प्रत्यावर्तन आत्मा में एवं आत्मा का प्रत्यावर्तन व्यापक सत्ता में होता है ।
  • प्रत्यावर्तन ही जागृति का कारण है ।
  • मानव में जागृति ज्ञान, विवेक, विज्ञान पूर्वक ही है जिसे बौद्धिक पक्ष कहते हैं । जो मानवीयता तथा अतिमानवीयता सहज है ।
  • जागृत मानव में मध्यस्थ व्यवहार, विचार व अनुभव पाया जाता है ।
Page 172 of 219