- ⁘ ईष्ट :- प्रयोजनशील व सार्थक इच्छा के अनुकूल मानवीयतापूर्ण व अतिमानवीयता सहज उपलब्धि ।
- ⁘ समाधान समृद्धि अभय सहअस्तित्व सहज ज्ञान, विवेक, विज्ञान है ।
- ⁘ अनिष्ट :- प्रयोजनशील व सार्थक इच्छा के प्रतिकूल उपलब्धि ।
- ⁘ उत्थान :- मानवीयता की ओर गति ।
- ⁘ पतन :- अमानवीयता की ओर गति ।
- ⁘ ह्रास :- अधिक मूल्यन से न्यून मूल्यन की ओर परिणाम ।
- ⁘ विकास :- न्यून मूल्य से अधिक मूल्य की ओर परिणाम ।
- ⁘ शोषण :- भ्रमवश किया गया कार्य-व्यवहार ।
- ⁘ पोषण :- मानवीयता, अतिमानवीयता सहज परंपरा ।
- ⁘ अनुचित :- समय, परिस्थिति तथा घटनाओं के संदर्भ में मानवीयता या अतिमानवीयता का शोषण, विरोध ।
- ⁘ उचित :- समय, परिस्थिति तथा घटनाओं के अनुसार मानवीयता या अतिमानवीयता का पोषण ।
- ⁘ लाभ :- कम वस्तु व सेवा के बदले में अधिक वस्तु व सेवा का पाना ।
- ⁘ हानि :- अधिक वस्तु व सेवा के बदले में कम वस्तु व सेवा का पाना ।
- ⁘ न्याय :- मानवीयता के पोषण के लिए संपादित क्रियाकलाप व व्यवहार । संबंधों की पहचान, मूल्यों का निर्वाह, मूल्यांकन, उभयतृप्ति ही न्याय है ।
- ⁘ अन्याय :- मानवीयता के विपरीत शोषण के लिए किया गया क्रियाकलाप व व्यवहार तथा अमानवीयतावश क्रियाकलाप व व्यवहार ही अन्याय है ।
- ⁘ पुण्य :- मानवीयता तथा अतिमानवीयतापूर्ण व्यवहार ।
- ⁘ पाप :- अमानवीयतावादी व्यवहार ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द