• अनुभव के लिए समझदारी, समझदारी के लिए अनुभूति, इच्छा के लिए समझदारी और समझदारी के लिए इच्छा, इच्छा के लिए क्रिया और क्रिया के लिये इच्छा, उपयोग के लिये क्रिया और क्रिया के लिए उपयोग, क्रिया के लिए उत्पादन और उत्पादन के लिए क्रिया व्यस्त है ।
  • रूप क्रिया की गणना काल, सम्वेग, वेग , विसर्जन, गुण व स्वभाव के अनुसार स्थूल व सूक्ष्म भेद से है, जो मानव की समझदारी (ज्ञान) बुद्धि में भाव, इच्छा में प्रतिभाव, विचार में अनुभाव, मन से प्रवृत्तियों के रूप में व्यक्त होती है ।
  • सुरूप व कुरूप के भेद से रूप, जड़ व चैतन्य के भेद से क्रिया, लोक व लोकेश के भेद से लक्ष्य, विषय व निर्विषय व्यवस्था के भेद से ज्ञान, विधि व निषेध के भेद से कर्म, सार्थक व निरर्थक भेद से भाषा है ।
  • अवस्था भेद से आसक्ति एवं समाधान, आसक्ति एवं समाधान भेद से आवश्यकता, आवश्यकता भेद से श्रम, श्रम भेद से उत्पादन, उत्पादन भेद से उपलब्धि, उपलब्धि भेद से परिणाम, परिणाम भेद से ही क्षमता, योग्यता एवं पात्रता; क्षमता, योग्यता एवं पात्रता भेद से सहजात्मक, लोकात्मक (ईषणात्मक) और विषयात्मक प्रवृत्तियाँ तथा इन तीनों अथवा इनके मिश्रित बौद्धिक अवस्था में ही चित्रण की अभिव्यक्ति की समर्थता है ।
  • सतर्कता, सजगता, सहजता प्राप्त मानव जीवन में विश्राम का तथा लोकासक्त मानव जीवन में श्रम का क्षोभ है ।
  • मानव ने अपनी क्षमता, योग्यता और पात्रता के अनुसार सहजोन्मुखता में नित्यता का, लोकोन्मुखता में अमरत्व का बोध और विषयोन्मुखता में अनित्यता की स्वीकृति किया है। सहजता में दिखावा, रहस्य तथा अविद्या व भ्रम का पूर्ण विलय होता है । इसीलिए जागृत मानव विकार से मुक्त है । साथ ही इस स्थिति में निरंतर तृप्ति, समाधान और विश्राम का अनुभव है ।
  • लोकेषणा ही श्रेष्ठ ऐषणा है । देव मानव स्वयं की जागृति को प्रमाणित करने के अर्थ में मानवीय परंपरा का पोषण और सम्वर्धन के लिए जन बल व धन का नियोजन करते हैं । यही यश का कारण व स्वरूप है, जिसकी सार्थकता मानव परंपरा में व्यवस्था सार्वभौमिकता के रूप में होना है । इसके फलन में अखंड समाज का ख्याति होना
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