• समझदारी की आंशिकता में क्रिया, क्रिया की आंशिकता में भोग, भोग के अनुपात में इंद्रियानुभव और इसके अतिरिक्त अनुमान के कारण ज्ञानवर्धन संपन्न हुआ है । मूल में पूर्ण ज्ञान व्यंजना का अधिकार आत्मा में है ।
  • व्यंजना :- अनुभव क्रिया का प्रभावशील, क्षमता अथवा प्रभाव क्षेत्र ।
  • अज्ञान, आलस्य, अत्याशा, आक्रोश, आवेश, प्रलोभन, अभाव व रोग पक्ष ही दु:ख का कारण है । समस्त दु:ख का मूल भ्रम में ही है ।
  • ह्रासांश में स्थित इकाई के लिए दो कारण हैं :- प्रथम है, अजागृति तथा द्वितीय है, शक्ति का अपव्यय ।
  • अजागृत को जागृत बनाना ही सामाजिकता का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य और कार्यक्र म है ।
  • # जो जिसको अधिक मूल्यवान मानता है, उसी के लिए वह अपने तन, मन व धन का व्यय करता है । ऐसी मूल्यांकन क्रिया मनुष्य के द्वारा निर्भ्रान्त, भ्रान्ताभ्रान्त और भ्रान्त अवस्था भेद से होती है जिसके कारण कुछ मनुष्यों ने चार विषयों, कुछ मनीषियों ने तीन ऐषणाओं कुछ निर्भ्रान्त मानवों ने भ्रममुक्ति को परमावधि मूल्यांकित किया है । इस मूल्यांकन के अनुरूप ही विभिन्न स्तर के मनुष्यों द्वारा समस्त साधनों का नियोजन किया गया है ।
  • मानव कुल में निहित वैविध्यता का निराकरण केवल न्यायपूर्ण व्यवहार समाधान पूर्ण विचार नीति से संभव हुआ है ।
  • भ्रांत स्थिति से की गयी मूल्यांकन क्रिया को आसक्ति, भ्रांताभ्रांत स्थिति से किए गए मूल्यांकन की जागृति तथा निभ्रांत स्थिति से किए गए मूल्यांकन स्थिति की ‘यथार्थ’ संज्ञा है ।
  • यथार्थ मूल्यांकन क्षमता ही दर्शन की पूर्णता, दर्शन की पूर्णता ही संतुलन, पूर्ण संतुलन ही ज्ञान, ज्ञान ही व्यापकता में अनुभूति, व्यापक में अनुभूति ही निर्भ्रमता और निर्भ्रमता से ही यथार्थ मूल्यांकन क्रिया नि:सृत होती है । ऐसी इकाई में न्याय पूर्ण व्यवहार और धर्म पूर्ण विचार स्वभाव के रूप में परिलक्षित होता है ।
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