आवश्यक है । लोकेषणा अर्थात् जागृत मानव परंपरा को लोकव्यापीकरण करने के क्रम में यश का स्वीकृति है । यश का तात्पर्य-जागृति की स्वीकृति, सहानुभूति, अनुकरण क्रिया है । मानवीयता के विरोधी जितने भी कायिक, वाचिक, मानसिक क्रियाकलाप है उससे मुक्त रहना ही यश है ।

  • चारों विषय इंद्रिय तृप्ति से सीमित है । स्थूल शरीर मात्र की मृत्यु निश्चित है इसलिए विषयों से प्राप्त सुख की निरंतरता नहीं है ।
  • मानवीयता पूर्ण परंपरा सहज उद्देश्य से प्रयास, प्रयास भेद से साधनों का उपयोग, सदुपयोग; उपयोग, सदुपयोग भेद से फल; फल से प्रयोजन; प्रयोजन से उद्देश्य सफल होना पाया जाता है । यही जागृति पूर्ण जीवन परंपरा चक्र है ।
  • समस्त साधनों की गणना अंतरंग और बहिरंग भेद से है ।
  • बहिरंग साधन :- शरीर व उससे उत्पन्न या उत्पादित समस्त वस्तुएँ बहिरंग साधन हैं ।
  • अंतरंग साधन :- मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि व उससे उत्पन्न संकल्प, इच्छा, विचार व आशा अंतरंग साधन है ।
  • शरीर का साध्य मन, मन का साध्य वृत्ति, वृत्ति का साध्य चित्त, चित्त का साध्य बुद्धि, बुद्धि का साध्य आत्मा और आत्मा का साध्य सहअस्तित्व में अनुभव सहज प्रमाण है ।
  • साध्य :- जिसको पाना है ।
  • साधन :- साध्य को पाने हेतु आवश्यक प्रयुक्ति, उपाय एवं वस्तु ।
  • साधक :- साध्य को पाने हेतु साधन को जो प्रयुक्त करता है ।
  • जिसकी जागृति और तृप्ति शेष है, उसे ही शेष जागृति को प्राप्त करने के लिये साधन की आवश्यकता है ।
  • आत्मा का पूर्ण विकास (ज्ञान की पारदर्शकता) सहअस्तित्व में अनुभूति में, बुद्धि का पूर्ण विकास आत्मा के संकेत ग्रहण से, चित्त का पूर्ण विकास बुद्धि के संकेत बोध की सत्यसाक्षी में कलाकरण योग्य क्षमता से, वृत्ति का पूर्ण विकास चित्त के संकेत ग्रहण अर्थात् धर्म पूर्ण विचार निर्माण योग्यता से तथा मन का पूर्ण विकास वृत्ति का संकेत ग्रहण कर न्यायसम्मत व्यवहार पात्रता अर्जित करने से है ।
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