- ⁘ इच्छा :- वांछित एवं इप्सित के प्रति सजगता ।
- ⁘ विद्या :- जो जैसा है, उसको वैसा ही स्वीकार करना ।
- ⁘ प्रज्ञा :- यथार्थ की पूर्ण अनुमान सहित पूर्ण स्वीकृति क्रिया ।
- ⁘ कीर्ति :- विकास की ओर सक्रियता ।
- ⁘ विचार :- स्फुरण पूर्वक सत्यता को उद्घाटित करने हेतु की गई क्रिया ।
- ⁘ निश्चय :- सत्यतापूर्ण विचार की निरंतरता ।
- ⁘ धैर्य :- न्यायपूर्ण विचार की निरंतरता ।
- ⁘ शांति :- समाधान पूर्ण विचार व्यवहार में गतित होना ।
- ⁘ दया :- दूसरे के विकास में हस्तक्षेप न करना, सहायक होना ।
- ⁘ दम :- ह्रास की ओर जो आसक्ति है, उसकी समापन क्रिया । उत्थान की ओर प्रवृत्त।
- ⁘ कृपा :- दूसरे मानव के जागृति के लिये सहायता अथवा पात्रता अर्जित करने में सहायक होना ।
- ⁘ करुणा :- जागृति के लिए उत्प्रेरित करना अथवा जागृति के लिए योग्यता और पात्रता अर्जित करने में सहायक होना ।
- ⁘ उत्साह :- जागृति के लिये प्रवृत्ति, उत्सव, सजगता ।
- ⁘ कल्पना :- मान्यता का पूर्व रूप ।
- ⁘ भाव :- मूल्य, मूल्यांकन ।
- ⁘ श्रद्धा :- श्रेय की ओर गतिशीलता ।
- ⁘ क्षमा :- जागृति के लिए की जाने वाली सहायता के समय उसके ह्रास पक्ष से अप्रभावित रहना ।
- ⁘ अनुराग :- निर्भ्रम ज्ञान की निरंतरता में अनन्यता ।
- ⁘ जाति :- रूप, गुण, स्वभाव व धर्म की विशिष्टता एवं भौतिकता ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द