- ⁘ आवश्यकता :- निर्वाह के लिए समुचित साधनों के प्रति (जो समझदार परिवार में निर्धारित होता है) तीव्र इच्छा ही आवश्यकता है । यह शरीर पोषण-संरक्षण समाज गति के अर्थ में ।
- ⁘ समुचित साधन :- मानव की परस्परता में व्यवहार, प्रयोग एवं उत्पादन को संतुलित, समृद्ध एवं जागृति पूर्ण प्रमाण परंपरा के लिए प्रयुक्त आवश्यकीय साधनों की समुचित साधन संज्ञा है । शरीर पोषण, संरक्षण व समाज गति के लिए अर्पित, समर्पित वस्तुयें समुचित साधन हैं ।
- ⁘ प्रयोग :- मानव की आवश्यकता के रूप में प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता मूल्य व कला मूल्य को स्थापित करने हेतु सफल होते तक प्रयास ही प्रयोग है ।
- ⁘ उत्पादन :- प्रयोग को सामान्यीकृत करने हेतु विकसित क्रिया पद्धति में श्रम नियोजन प्रक्रिया की उत्पादन संज्ञा है जिसमें बहुतायत उत्पादन की अथवा निर्माण की कामना सन्निहित रहती ही है ।
- ⁘ अर्थोपार्जन :- प्राकृतिक ऐश्वर्य पर उपाय पूर्वक श्रम नियोजन से कला एवं उपयोगिता की सिद्ध मात्रा की धनोपार्जन संज्ञा हैं ।
- ⁘ उपयोग :- उत्पादन व सेवा के लिए प्रयुक्त अर्थ की उपयोग संज्ञा है ।
- ⁘ उत्पादन :- उत्पादन दो भेद से होता है - सामान्य आकाँक्षा से अथवा महत्वाकाँक्षा से ।
- ⁘ सामान्य आकाँक्षा :- आहार, आवास एवं अलंकार में प्रयुक्त वस्तुओं को सामान्य आकाँक्षा संज्ञा है ।
- ⁘ महत्वाकाँक्षा :- दूरगमन, दूरदर्शन तथा दूरश्रवण के लिए प्रयुक्त वस्तुओं को महत्वाकाँक्षा संज्ञा है ।
- ⁘ सदुपयोग :- परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था में भागीदारी करते हुए तन, मन, धन रूपी अर्थ का नियोजन सदुपयोग है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द