- # न्याय :- मानवीयता के संरक्षणात्मक नीतिपूर्वक किये जाने वाले व्यवहार व्यवस्था ही न्याय है ।
- ● अतिमानवीय स्वभाव, विषय एवं दृष्टि की जागृति के लिए समुचित अवसर एवं साधन को नियोजित करने वाली व्यवस्था एवं वैयक्तिक प्रयास को अतिमानवीय सामाजिक व्यवस्था कहते हैं । अखण्ड समाज, परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था व मानव सहज प्रमाण परम्परा ही अतिमानवीय सामाजिक व्यवस्था है ।
- ⁘ अतिमानवीय स्वभाव :- दया, कृपा और करुणा ही अति-मानवीय स्वभाव है ।
- ⁘ दया :- जिनमें पात्रता हो, परंतु उसके अनुरूप वस्तु उपलब्ध न हो, ऐसी स्थिति में उसे वस्तु उपलब्ध कराने हेतु की गयी प्रयुक्ति ही दया है ।
- ⁘ कृपा :- वस्तु समीचीन है पर उसके अनुरूप पात्रता अर्थात् मानवीयतापूर्ण दृष्टि नहीं है, उनको पात्रता उपलब्ध कराने वाली प्रयुक्ति कृपा है ।
- ⁘ करुणा :- जिनमें पात्रता न हो और वस्तु भी समीचीन न हों, उनको उसे उपलब्ध कराने वाली प्रयुक्ति ही करुणा है ।
- ⁘ अतिमानवीय विषय :- सत्य (सह-अस्तित्व रूपी परम सत्य)
- ⁘ अतिमानवीय दृष्टि :- मात्र सत्य ।
- ● न्याय व अन्याय सहित लक्ष्य भेद से संपर्क सफल एवं असफल सिद्ध होता है, जिससे सामाजिकता का विकास व ह्रास सिद्ध होता है ।
- ⁘ सम्पर्क :- जिस परस्परता में प्रत्याशाएँ ऐच्छिक रूप में निहित है, ऐसे मिलन की संपर्क संज्ञा है ।
- ⁕ ऐहिक उद्देश्य (जीव चेतना वश) से संबंध नहीं है । संबंध आमुष्मिक उद्देश्य (विकसित चेतना, मानव, देव मानव दिव्य मानव सहज प्रमाण) पूर्वक ही हैं, जिनका निर्वाह ही जागृति है ।
- ⁘ संबंध :- जिस परस्परता में प्रत्याशाएँ पूर्णता के अर्थ में पूर्व निश्चित रहती हैं, ऐसे मिलन की संबंध संज्ञा है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द