- ● धीरता, वीरता, उदारता सहित व्यवहार ही न्याय, धर्म, सत्य की एकसूत्रता है ।
- # एकसूत्रता का अर्थ है, परस्पर जागृति के लिये पूरक तथा सहायक हो जाना ।
- # उपरिवर्णित एकसूत्रता के अपेक्षाकृत अध्ययन के आधार पर मानव अपने ह्रास एवं जागृति के कारण भ्रांत, भ्रान्ताभ्रान्त तथा निर्भ्रान्त अवस्था में परिलक्षित होना समीचीन है ।
- ● निर्भ्रान्त मानव से ही एकसूत्रता सफल है । इसलिए यह सिद्ध होता है कि निर्भ्रान्त मानव बनने के लिए सामाजिकता की परमावश्यकता है ।
- ● विवेक एवं विज्ञान के संतुलित अध्ययन तथा व्यवस्था के अभाव में मानव में एकसूत्रता नहीं पाई जाती है ।
- ⁘ भौतिक रासायनिक प्रयोगों के अध्ययन को भौतिक विज्ञान संज्ञा एवं बौद्धिक अध्ययन को विवेक संज्ञा है । विवेक पूर्वक लक्ष्य का निर्धारण होता है तथा विज्ञान द्वारा लक्ष्य प्राप्ति के लिए दिशा का निर्धारण होता है ।
- ● बौद्धिक अध्ययन की पूर्णता से ही व्यापकता का बोध है ।
- ● भौतिक समृद्धि के लिए भौतिकीय अध्ययन एवं कर्माभ्यास आवश्यक है, जो कि उपयोग और सदुपयोग दोनों में प्रयुक्त है । साथ ही समस्त अध्ययन कर्म आवश्यकता की पूर्ति हेतु उत्पादन, सदुपयोग क्रियाएँ जागृत बुद्धि के अभाव में सिद्ध नहीं है । अत: हम मानव बौद्धिक अध्ययन हेतु बाध्य हैं ।
- ● अध्ययन के मूल में जड़-चैतन्य पक्ष का तथा जड़-चैतन्य पक्ष के मूल में ह्रास एवं विकास का; ह्रास एवं विकास के मूल में श्रम, गति व परिणाम का; विकास के अर्थ में परिणाम का अमरत्व, श्रम का विश्राम, गति का गन्तव्य; श्रम, गति व परिणाम के मूल में इकाईत्व का, इकाईत्व के मूल में साम्य रूप से प्राप्त ऊर्जा रूपी सत्ता में अनुभव करने वाली विश्रामस्थ जीवन इकाई का अध्ययन आवश्यक है ।
- ● प्रत्येक अवस्था के परमाणु क्रियाशील हैं । इन सबको सम्यक रूप से प्राप्त सत्ता शून्य, व्यापक ही है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द