- ● हर इकाई अनन्त की तुलना में अंश ही है ।
- ● हर इकाई का गठन अनेक अंशों से सम्पन्न है ।
- ● विखण्डन पूर्वक एकसूत्रता की उपलब्धि सिद्ध नहीं है, क्योंकि क्रिया किसी गठन पर ही आधारित होती है । इसी आधार पर विखण्डन विधि में दाह (ताप या दुःख) पाया जाता है यह दाह, ताप या दुःख पुनः दूसरे के लिये विखण्डन क्रिया के लिए कारक बन जाता है ।
- ● विखण्डन क्रिया से किसी का अस्तित्व मिटाया नहीं जा सकता है, क्योंकि गणितशः इकाई का विखण्डन करते-करते भी कुछ शेष रह ही जाता है । मानव परम्परा में विखण्डन को समुदायों के रूप में पहचाना जाता है और अखण्डता में एकसूत्रता पूर्वक सम्पूर्ण मानव एक इकाई के रूप में पहचान में आता है ।
- ● मानव लौकिक एवम् पारलौकिक भेद से व्यवहार करता है ।
- ● समस्त लौकिक व्यवहार स्वार्थ या परार्थ भेद से है तथा पारलौकिक व्यवहार सबीज और निर्बीज भेद से हैं ।
- ● स्वार्थ (प्रलोभन) अर्थ व काम के भेद से है ।
- ● परार्थ व्यवहार धर्म और अर्थ के भेद से है ।
- ● परमार्थ विचार एवम् व्यवहार धर्म तथा मोक्ष के भेद से है ।
- ● मानवीयता के लिये आवश्यकीय नियमपूर्वक किये गये समस्त राज्यनीति एवम् धर्मनीति सम्मत व्यवहार को ‘नैतिक’ तथा भ्रमवश अमानवीयता पूर्वक किये गये व्यवहार को ‘अनैतिक’ संज्ञा है ।
- ● नैतिक एवम् अनैतिक भेद से स्वार्थ वादी व्यवहार है । इसका सम्बन्ध स्वजन, स्ववर्ग, स्वजाति, स्वमन, स्वसम्प्रदाय, स्वपक्ष तथा स्वभाषा भेद से है, जबकि परार्थ व्यवहार सर्व जन, सर्व वर्ग, सर्व जाति, सर्व मन, सर्व सम्प्रदाय, सर्व पक्ष तथा सर्व भाषा भेद से है ।
- ● स्वजन, वस्तु व सेवा को महत्वपूर्ण और अन्य को गौण समझने वाली प्रवृत्ति की स्वार्थ संज्ञा है । इसी प्रकार परजन, वस्तु व सेवा में अधिक महत्व का अनुमान करने वाली प्रवृत्ति व प्रयास को परार्थ संज्ञा दी जाती है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द