• विवेक अथवा अविवेक, विज्ञान अथवा सामान्य ज्ञान संपन्न विचार व मर्यादा के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय जीवन की घटनाएँ मानव समुदाय के संगठन व विघटन के रूप में भावी क्षणों में प्रतिष्ठित हैं ।
  • मानव समुदाय रुप में जितना विघटन को प्राप्त करे उतना ही ह्रास है तथा जितना संगठन को प्राप्त करे उतना ही जागृत परंपरा की ओर उन्नति है ।
  • मानव समुदाय में गलती के बिना वैचारिक मतभेद सिद्ध नहीं है ।
  • नियमपूर्वक किये गये कार्य एवं विचार को ‘सुकर्म’ तथा इसके विपरीत ‘दुष्कर्म’ संज्ञा है।
  • नैतिकता संपन्न (राज्यनीति तथा धर्म नीति संपन्न) कुशलता, निपुणता, पाण्डित्य सहित किये गये चरित्र चित्रण को ‘सच्चरित्र’ तथा उसके विपरीत को ‘दुश्चरित्र’ संज्ञा है ।
  • सिद्धांत मात्र सत्य ही है । सिद्धांत वैविध्यता का कारण नहीं है । सिद्धांत में वैविध्यता है भी नहीं । यदि है, तो सिद्धांत नहीं है ।
  • मानव लक्ष्य (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) को पहचानने के लिए प्राप्त ज्ञान ही विवेक है ।
  • विज्ञान :- भौतिक समृद्धि एवं मानव लक्ष्य जीवन लक्ष्य की सफलता के लिए दिशा निर्धारण ज्ञान ही विज्ञान है ।
  • अस्तु, अंतर्राष्ट्रीयता का मूल उद्देश्य बौद्धिक समाधान तथा भौतिक समृद्धि का संतुलन एवं संरक्षण बनाये रखना ही सिद्ध होता है, जिससे अखण्ड मानव समाज में सहअस्तित्व सिद्ध होता है, अन्यथा सहअस्तित्वविहीन मानव समुदाय विखंडन के रूप में है ही ।
  • अंतरंग (वैचारिक) एवं बहिरंग (व्यवहार) भेद से सुगमताऍँ एवं दुर्गमताएँ हैं ।
  • आवश्यकता से अधिक उत्पादन के रूप में समृद्धि का, व्यक्तित्व के रूप में चरित्र का, प्रामाणिकता से सामाजिकता का; न्याय पालन, प्रबोधन तथा पोषण से राष्ट्र्रीयता का; विज्ञान व विवेक से प्राप्त समृद्धि, समाधान, अभय, सहअस्तित्व से अंतर्राष्ट्रीय जीवन का वैभव है, अन्यथा में ह्रास है ।
  • संग्रह कामना तृप्ति का पोषक नहीं है, क्योंकि संग्रह का पूर्ति नहीं है ।
Page 89 of 219
85 86 87 88 89 90 91 92 93