- ● मानव आकाँक्षाएं, सामान्य आकाँक्षाओं तथा महत्वाकाँक्षाओं के रूप में परिलक्षित हैं एवं मानव द्वारा तदनुसार ही उत्पादन व उपयोग-सदुपयोग विधि से अर्थ का नियोजन है ।
- ● मानव की सामान्य आकाँक्षा आहार, आवास एवं अलंकार भेद से है, जिसकी पूर्ति के लिये वह उत्पादन एवं उपभोग, सदुपयोग में व्यस्त है ।
- ● मानव की महत्वाकाँक्षाओं को मूलत: तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है - (1) दूरगमन, (2) दूरश्रवण तथा (3) दूरदर्शन । इनकी पूर्ति हेतु भी मानव उत्पादन एवं उपयोग में व्यस्त है ।
- ● सामान्य आकाँक्षा की अपूर्ति से असंतोष, पूर्ति से सशंकता तथा अधिकता से संतुष्टि होती है ।
- ● महत्वाकाँक्षा की अपूर्ति से कौतूहल, पूर्ति से तृप्ति तथा अधिकता से असंतोष होता है ।
- ● न्यायवादी तथा अवसरवादी नीति भेद से ही मानव ने दूसरों पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया है, जो देश, भाषा, वर्ग, जाति व बल प्रभावी भेद से पाया जाता है, जो राष्ट्र के प्रति निष्ठा या विद्रोह के रूप में व्यक्त होता है ।
- ● अन्यायवादी विधि (कानून), विधान व नीति से हिंसा, प्रतिहिंसा, सशंकता तथा आतंक का प्रसव होता है ।
- ● हर मानव में न्याय की याचना जन्मजात स्वभाव के रूप में पायी जाती है, जिसका स्पष्टीकरण योग्य अध्ययन अति आवश्यक है ।
- ● भ्रमवश माने हुए न्याय से अन्याय का और अन्याय से अन्याय दमन करने के लक्ष्य भेद के आशय से समस्त विधि, विधान एवं नीतियों का अनुमोदन मानव करता है । इसी आधार पर एक अथवा अनेक राष्ट्रों का जीवन असफल है ।
- ● पूर्ण दर्शन लोक-व्याप्त है । अपूर्ण दर्शन मानव सम्पर्क की सीमा तक है ।
- ● रहस्यों का उन्मूलन करने वाले दर्शन को ‘पूर्ण’ दर्शन संज्ञा है ।
- ● रहस्यों का निवारण सहअस्तित्व में जागृति रूपी अध्यात्म ज्ञान, बौद्धिक ज्ञान तथा भौतिक विज्ञान के एकसूत्रात्मक अध्ययन से ही संभव है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द