• लोक के प्रति अनासक्त मानवों ने ही ज्ञानानुभव किया है । ऐसे अनुभूत व्यक्तियों में व्यवहारिक संतुलन एवं वैचारिक समाधान सहज ही रहता है ।
  • इच्छा की अपेक्षा में संवेदन क्रिया अल्प है । इच्छा शक्ति अधिक से अधिक क्रिया में व्यस्त है । अनुपात से अधिक शक्ति नियोजन अपव्यय है । यह अपव्यय ही आसक्ति है । इसका निरोध तथा नियंत्रण ही अनासक्ति है ।
  • प्रधानत: कारणानुक्रम से अध्यात्म ज्ञान का, गुणानुक्रम न्याय से बौद्धिक ज्ञान का और गणितानुक्रम नियम से भौतिक विज्ञान का अनुसंधान, आविष्कार और उपलब्धियाँ सार्थक होती हैं ।
  • परस्पर अनुशासित (नियंत्रित) या अनुवर्तित लोक-व्यूह की ब्रम्हांड संज्ञा है, जिसमें अनेक सौर-व्यूह हैं ।
  • गणितानुक्रम नियम से क्रिया, प्रतिक्रिया एवं परिपाक (फल) का; गुणानुक्रम न्याय से ह्रास एवं जागृति का; कारणानुक्रम विधि से सापेक्ष एवं निरपेक्ष ऊर्जा (शक्ति) में संपूर्ण प्रकृति का अध्ययन आभास एवं अनुभव पूर्ण हुआ है ।
  • निरपेक्षता के बिना व्यापकता सिद्ध नहीं है, क्योंकि सापेक्ष मात्र ससीम ही है ।
  • व्यापक ही ज्ञान, ज्ञान में अनुभव ही समझ है; समझ ही ज्ञान, विज्ञान, विवेक के रूप में प्रमाण है; ज्ञान ही नियम; नियम ही नियंत्रण; नियंत्रण ही संतुलन; संतुलन पूर्वक जीना ही मानव में न्याय; सार्वभौम व्यवस्था में न्याय पूर्वक जीना ही धर्म अर्थात् समाधान; सहअस्तित्व में अनुभव ही धर्म और सत्य है । निरपेक्ष सत्ता में नियम पूर्ण ज्ञान की अभिव्यक्ति नित्य वर्तमान है ।
  • नियंत्रण महिमा व्यापक और नियंत्रित अनेक हैं ।
  • जो नियंत्रित है वह इकाई है, यही क्रिया है ।
  • क्रियाएं अनंत हैं तथा समस्त क्रियाएं सत्ता में ही ओतप्रोत व नियंत्रित है, जिससे हर इकाई शक्त है अर्थात् सत्ता में ही हर इकाई को शक्ति प्राप्त है ।
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