- ● समस्त मानव के लिये जागृति के अवसर समान हैं, जिनका सदुपयोग एवं दुरूपयोग वातावरण, अध्ययन तथा पूर्व-संस्काराधीन है ।
- ● संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था, यह चार प्रकार से मानव-कृत वातावरण है, जिससे मानवीयता का पोषण अथवा शोषण होता है ।
- ● बौद्धिक समाधान व भौतिक समृद्धि तथा विकल्पात्मक ज्ञान जिस प्रकार के मानवकृत वातावरण से बोधगम्य होता हो, इससे ही मानव के विकास व जागृति का मार्ग प्रशस्त होता है ।
- ● वर्तमान के पूर्व में की गई क्रिया मात्र का फल परिणाम ही ‘संस्कार’ है, जो अमानवीयता, मानवीयता तथा अतिमानवीयतापूर्ण भेद से है, जिसके आधार पर ही इकाई की क्षमता, योग्यता एवं पात्रता है । जागृति के पक्ष में क्रिया ही सुसंस्कार है । सुसंस्कार के विपरीत जितने भी क्रियाकलाप हैं, वह अमानवीय जो कुसंस्कार है ।
“सर्व शुभ हो”