• शक्त ही इकाई; इकाई ही स्पंदन; स्पंदन ही क्रिया; क्रिया ही अनेकता; अनेकता ही संपूर्णता; संपूर्णता ही परस्परता; परस्परता ही नियंत्रण; नियंत्रण ही परिणाम; परिणाम ही ह्रास एवं विकास; ह्रास एवं विकास ही अवस्था; विकसित अवस्था ही चैतन्य पद; चैतन्य पद ही स्फुरण; स्फुरण ही कंपन; कंपन ही प्रतिभा; प्रतिभा ही प्रतीति; प्रतीति ही भास; भास, आभास, प्रतीति ही अध्ययन; अध्ययन ही विज्ञान एवं विवेक; विज्ञान एवं विवेक ही दर्शन; दर्शन ही निर्भ्रमता; निर्भ्रमता ही समाधान; समाधान ही आनन्द; आनन्द ही पूर्णता; पूर्णता ही जागृति; पूर्ण जागृति ही विश्राम तथा विश्रामस्थ इकाई ही पूर्ण शक्त है।
  • हर मानव; प्राप्त शक्ति की अनुभूति करने तक अविश्रान्त श्रृंखला में पाया जाता है ।
  • गठन रहित इकाई नहीं है । हर गठन में कई अंशों या अंगों एवं इकाईयों को पाया जाना अनिवार्य है ।
  • हर परमाणु किसी विकास क्रमांश में अवस्थित है ।
  • हर विकास क्रमांश में स्थित परमाणु के मध्यांश में मध्यस्थ क्रिया होती है जो मध्यस्थ होने के कारण अन्य अंशों से अधिक शक्त है अन्य अंशों को संतुलित किया रहता है । मध्यांश मध्यस्थ क्रिया है, जबकि आश्रितांश सम या विषम क्रिया हैं ।
  • मानव को पूर्ण पद या पूर्ण जागृति या पूर्ण विश्राम पाने का अवसर है । इसीलिये समस्त प्रयास भी है ।
  • ज्ञानावस्था की निर्भ्रान्त इकाई पूर्ण जागृत, भ्रान्ताभ्रान्त इकाई पूर्ण जागृति को प्रमाणित करने के अति निकट तथा भ्रान्त इकाईयाँ निकट है ।
  • रूप, बल, बुद्धि, पद एवं धन की विषमता से ही मानव में परस्पर स्पर्धा, प्रलोभन, आकाँक्षा, उत्साह, अध्ययन, अनुसंधान, संधान, प्रयोग, व्यवसाय और ईर्ष्या, द्वेष, आतंक, हिंसा, छल, कपट, दंभ तथा पाखंड का भी प्रसव है, जिससे मानव का विकास अथवा ह्रास सिद्ध है ।
  • सहअस्तित्व में विरोध का विजय अथवा शमन, विरोध शमन से जागृति, जागृति से सहज जीवन, सहज जीवन से स्वर्गीयता, स्वर्गीयता से सहअस्तित्व में अनुभव, अनुभव से कर्त्तव्य निष्ठा, कर्त्तव्य निष्ठा से सफलता, सफलता से विज्ञान एवं विवेक, विज्ञान एवं विवेक से स्वयंर्स्फूत जीवन और स्वयंर्स्फूत जीवन से ही सहअस्तित्व प्रमाणित होता है ।
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