(1) व्यवस्था द्वारा सभी व्यक्तियों में उनकी क्षमता, पात्रता एवम् योग्यता के आधार पर उत्पादन कार्य में प्रवृत होने वाली नीति का विकास । इसका स्पष्ट स्वरूप परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन से है एवं समाधान-समृद्धि हर परिवार में प्रमाणित होने से है ।
(2) परिवार समृद्धि के लिये प्रोत्साहन देना तथा तदनुरूप साधन सुलभता करने की नीति को अपनाना ।
(3) जागृति सहज क्षमता, योग्यता एवम् पात्रता के आधार पर सम्मान व गौरव प्रदान करना ।
(4) उत्पादन हेतु अधिकतम श्रम व साधन व्यय करने हेतु प्रोत्साहन देने वाली नीति का विकास करना ।
(5) अनेक जाति, वर्ग, मत, सम्प्रदायों एवम् पक्षात्मक विचारों से मुक्त समाधान पूर्ण मानवीयता सहज अखण्ड समाज नीति का विकास करना ।
(6) स्वधन, स्वनारी/स्व पुरुष, दया पूर्ण कार्य-व्यवहार को स्थापित करने वाली नीति का विकास करना ।
(7) हर परिवार में समाधान, समृद्धि सहज आधार पर अमीरी-गरीबी का असंतुलन समाप्त करना ।
(8) व्यवस्था के अंतर्गत हर आयुवर्ग के नर-नारियों को न्याय सुलभ कराने वाली पद्धति का विकास करना ।
- ⁕ समस्त अर्थ नीति द्वारा मानवीयता पूर्ण दृष्टि, स्वभाव व विषय को लक्ष्य में रखते हुए समस्त संपर्क तथा संबंधों का निर्वाह करने में व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक को समृद्धि होने की पूर्ण संभावना होनी चाहिये, जिसका मूर्त रूप अधिक उत्पादन व कम उपभोग पूर्वक स्वधन, स्वनारी-स्वपुरुष एवं दयापूर्ण क्रियाओं में निष्ठा एवं परधन, परनारी-परपुरुष एवं परपीड़ात्मक क्रियाओं का निराकरण ही है, क्योंकि अंततोगत्वा समस्त संपर्क एवं संबंध और स्वत्व का साकार व्यवहार्य रूप स्वधन, स्वनारी-स्वपुरुष और दयापूर्ण कार्य व्यवहार ही है ।