• उपरोक्तानुसार विधि एवम् निषेध को मूल आधार स्वीकार कर समस्त अर्थ-तन, मन एवम् धन की सुरक्षा की नीति निर्धारित होना स्वाभाविक है ।
  • राष्ट्रीय स्तर पर राज्य-नीति निम्न छः दृष्टिकोण से निर्धारित की जानी चाहिए तथा उसका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए । इन बिन्दुओं के आधार पर मानव के सहअस्तित्व, जागृति तथा समृद्धि की दृष्टि से व्यवस्था तथा स्वानुशासन का सामान्यीकरण महत्वपूर्ण सिद्ध होता है।
  • # 1. राष्ट्रीय सुरक्षा, सहअस्तित्व सिद्धान्त से ।
  • # 2. आर्थिक सुरक्षा, परिवार सहज आवश्यकता से अधिक उत्पादन सिद्धान्त आवर्तनशील विधि से ।
  • # 3. उत्पादन सुरक्षा, प्राकृतिक सन्तुलन को बनाये रखने के सिद्धान्त से ।
  • # 4. विनिमय सुरक्षा, श्रम नियोजन व विनिमय सिद्धान्त से ।
  • # 5. विद्याध्ययन संस्कार सुरक्षा, सहअस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिन्तन ज्ञान विधि से ।
  • # 6. नैतिक सुरक्षा, तन, मन, धन रूपी अर्थ का सदुपयोग सुरक्षा से ।
  • # 1. राष्ट्रीय सुरक्षा :- राष्ट्रीय जनजाति (राष्ट्र में रहने वाले मानव) में राष्ट्रीय स्वत्व स्वतंत्रता अधिकार धारणा एवम् निष्ठा को सुरक्षित रखना । राष्ट्रीय सुरक्षात्मक नीति अखण्ड समाज, सार्वभौम व्यवस्था सहज है । जिससे राष्ट्रान्तर्गत व्यक्ति, परिवार तथा समाज को सुरक्षा का अनुभव हो सके और प्रत्येक व्यक्ति भय से रहित होकर व्यवस्था, व्यवसाय एवं व्यवहार में रत हो सके, जिससे समाधान समृद्धि-पूर्ण जीवन का अनुभव कर सकने का अवसर उपलब्ध हो । स्पष्ट है कि ऐसी नीति मात्र मानवीय दृष्टि को लक्ष्य में रखकर ही निर्धारित की जा सकती है, साथ ही ऐसी नीति में अन्य राष्ट्रों के शोषण की कोई संभावना न होने से परस्पर सहअस्तित्व के लिये विश्वास के आधार का निर्माण होगा ।
  • # 2. आर्थिक सुरक्षा :- राष्ट्रीय अर्थ सुरक्षा का नीति निर्धारण निम्न बिन्दुओं के आधार पर किया जाना चाहिये :-
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