- # 3. उत्पादन सुरक्षा :- प्रत्येक व्यक्ति के श्रम और तकनीक का पूर्ण सदुपयोग करते हुए अर्थ के उत्पादन की दिशा में किये गये प्रयास की उत्पादन संज्ञा है । प्राकृतिक ऐश्वर्य पर श्रम नियोजन पूर्वक उपयोगिता एवं कला मूल्य को स्थापित करना ही उत्पादन है ।
- ⁘ प्राप्त श्रम अर्थात् निपुणता, कुशलता, पाण्डित्य का सदुपयोग ही अर्थ सुरक्षा है ।
- ⁕ मानव के लिये आवश्यकीय उत्पादन मुख्यत: दो ही हैं - 1. कृषि और 2. उद्योग । अन्य जितने भी व्यवसाय हैं, वह इनके आश्रय में तथा इनके पूरक सिद्ध होते हैं ।
- ⁕ उत्पादन की सुरक्षा के लिये व्यवस्था को निम्न तथ्यों के आधार पर नीति निर्धारण करना चाहिये ।
(1) निपुणता एवं कुशलता को वरीयता प्रदान करना ।
(2) निपुण एवं कुशल व्यक्ति को साधन उपलब्ध कराना ।
(3) मानव उपयोगी वस्तुओं यथा आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूरश्रवण तथा दूरदूर्शन के लिये वस्तुओं तथा उपकरणों पर प्रयोग तथा प्रयास को सहायता देने वाली नीति का विकास करना ।
(4) अधिकाधिक उत्पादन व व्यक्तित्व सम्पन्न करने वाली, निपुणता तथा कुशलता का समझदारी के साथ सामान्यीकरण करने वाली नीति का विकास करना ।
(5) श्रम के फल का शोषण न हो, ऐसी नीति का विकास करना ।
- ⁕ व्यवसाय की सुरक्षा के लिये नीति निर्धारण करते समय न्याय के आश्रय से या न्यायोचित उत्पादन नीति का विकास करने से ही संपर्क एवं संबंधों के निर्वाह हेतु उपयुक्त उपयोग, सदुपयोग, वितरण, प्रयोग व व्यवसाय के लिये समुचित अवसर उपलब्ध हो सकेगा ।
- # 4. विनिमय सुरक्षा - उत्पादित वस्तुओें का श्रम मूल्य मूल्यांकन सहित उपभोक्ता को प्राप्त कराने वाले कार्य की विनिमय संज्ञा है ।
- ⁕ विनिमय सुरक्षा के लिये निम्न आधार पर नीति निर्धारण होना चाहिए ।