• रहस्यता का उन्मूलन चैतन्य पक्ष (बौद्धिक) के जागृति के स्तर पर आधारित है । चैतन्य पक्ष (बौद्धिक) सहज जागृति स्तर भेद से उसकी अवस्थाएँ हैं ।
  • बौद्धिक विकास :- पूर्ण जागृत, जागृत अर्ध जागृत, अल्प जागृत तथा अजागृत भेद से है । इसे ही पूर्ण चेतन, चेतन, अर्ध चेतन, अल्प चेतन तथा अचेतन के नाम से भी संबोधित किया गया है ।
  • चैतन्य इकाई में मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि व आत्मा ये पाँच बल अविभाज्य हैं ।
  • मानव के प्रत्येक क्रियाकलाप में बौद्धिक प्रयुक्ति है । यह क्रम से आशा, विचार, इच्छा, संकल्प एवं अस्तित्वानुभूति है ।
  • भ्रमवश मन द्वारा संवेदना सापेक्ष आशा, वृत्ति के द्वारा आशा के अनुरूप विचार, चित्त के द्वारा विचार के अनुरूप इच्छा; यह इंद्रियमूलक संवेदनशील प्रणाली है । बुद्धि के आत्मविमुख होने से भ्रमित चित्रण और इच्छाओं का होना पाया जाता है ।
  • जागृति में मन की आशा वृत्ति की अनुरूपता में, वृत्ति के द्वारा विचार चित्त की अनुरूपता में, चित्त की इच्छा बुद्धि के बोधन के अनुरूप तथा बुद्धि आत्मा की अस्तित्वानुभूति पूर्वक सार्थक होती है । फलत: प्रत्यावर्तन-परावर्तन क्रियाएं सिद्ध होती हैं ।
  • स्थूल शरीर और मन के मध्य में आशा, मन और वृत्ति के मध्य में विचार, वृत्ति और चित्त के मध्य में इच्छा, चित्त और बुद्धि के मध्य में संकल्प तथा बुद्धि और आत्मा के मध्य में प्रमाण की अपेक्षा रहती है तथा यह आवर्तन क्रिया है । प्रत्यावर्तन-परावर्तन के संयुक्त रूप का नाम आवर्तन क्रिया है । यही जागृत जीवन चक्र है ।
  • इस प्रकार जीवन में सामरस्यता रहती है । शरीर के लिये मन, मन के लिये वृत्ति, वृत्ति के लिये चित्त, चित्त के लिये बुद्धि तथा बुद्धि के लिये आत्मा, आत्मा के लिये सहअस्तित्व में अनुभव सहज प्रेरकता है ।
  • स्थूल शरीर में संवेदनाओं की तृप्ति के लिए मन में आशा, मन की इस आशा के समर्थन में वृत्ति में विचार, वृत्ति के ऐसे विचार के समर्थन के लिए चित्त में इच्छा तथा चित्त में इच्छा के समर्थन के लिए बुद्धि में अपेक्षा अथवा कामना बनी रहती है । शरीर से मन, मन से वृत्ति, वृत्ति से चित्त तथा चित्त से बुद्धि विकसित इकाई होने के कारण इस परस्परता में विषमता रहती है । बुद्धि में यथार्थ अपेक्षा बनी रहती है ।
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