• # मन के अनुरूप ही स्थूल शरीर का संचालन है, जिससे कि इनके बीच में आशा बनी रहती है । परंतु वृत्ति मन से विकसित होने के कारण मन की आशा के अनुरूप नहीं बन पाती और परस्पर विषमता बनी ही रहती है । वृत्ति अपने अनुसार मन और शरीर का उपयोग चाहती है । इसी क्रम से वृत्ति, चित्त में विषमता बनी ही रहती है । यह विषमता ही श्रम की अनुभूति तथा विश्राम की तृषा के लिये कारण सिद्ध होती है ।
  • अनुभव मूलक विधि से सहअस्तित्व में अनुभव प्रमाण आत्मा में, अनुभव के अनुसार बोध बुद्धि में, बोधानुरूप चिंतन चित्त में, चिंतन अनुरूप तुलन (न्याय, धर्म, सत्य) वृत्ति में, तुलन अनुसार आस्वादन मन में होता है ।
  • अनुभवगामी विधि से वृत्ति में उत्पन्न विचारों के अनुरूप मन में आशा का होना तथा उसकी पूर्ति हेतु ही शरीर का उपयोग एवं सदुपयोग करने की, चित्त में उत्पन्न इच्छा को कार्यरूप देने हेतु विचार करने की, बुद्धि में आत्मानुभव के लिये किये गये संकल्प के अनुसार इच्छा की अपेक्षा का नियंत्रित बने रहना ही प्रत्यावर्तन क्रिया है ।
  • आत्मा के मध्यस्थ क्रिया होने के कारण - बुद्धि, चित्त, वृत्ति, मन तथा शरीर; आत्मा द्वारा अनुशासित तथा नियन्त्रित होना अस्तित्व सहज है । इस नियन्त्रण के विरोध के क्रम में जो प्रयास है, वह ही विषमता को जन्म देता है ।
  • मन, वृत्ति से; वृत्ति चित्त से; चित्त बुद्धि से; तथा बुद्धि आत्मा से आप्लावित रहती ही है । यही जागृति है फलत: इस क्रम में क्रियाशील होने पर, तृप्त होने के कारण, उनके क्रियाकलाप में पूर्ण सक्षमता आ जाती है, जिससे श्रम का क्षोभ नहीं होता तथा जीवन के सभी सोपानों में विश्राम प्रमाणित होता है । यही सर्वतोमुखी समाधान और अभ्युदय है । ऐसी स्थिति में शरीर पूर्णत: मन द्वारा नियंत्रित होता है । नियंत्रित अर्थात् संज्ञानशीलता के आधार पर संवेदनाएं नियंत्रित हो जाती हैं ।
  • जड़ परमाणु ही विकास पूर्वक चैतन्य अवस्था अथवा पद को पाता है ।
  • उपरोक्त क्रमानुसार जड़ परमाणु विकास को पाकर चैतन्य पद में जीवावस्था में संवेदनाओं को वंशानुसार पहचानने के रूप में प्रमाणित हैं । तात्पर्य यह है कि ‘जीवन-पुंज’ के रूप में एक परमाणु क्रियाशील रहता है ।
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