लिए अमानवीयता से मानवीयता की ओर न्यायपूर्ण व्यवहारपूर्वक स्वयं को अपनी स्थिति में पाता है । साधक जब अभ्यासपूर्वक पूर्णतया न्यायपूर्ण व्यवहार व धर्मपूर्ण विचार में प्रतिष्ठित हो जाता है, तो तत्काल ही ऐसी तात्विकता सहित प्रतिभा संपन्न साधक, देव मानव एवं दिव्य मानवीयता के लिए जो शेष जागृति है, उसकी पूर्ति हेतु चैतन्य पक्ष की क्षमता को विकसित करना आरंभ कर देता है । फलस्वरूप ही देव मानवीयता और दिव्य मानवीयता का पात्र बनता है और व्यापकता की अनुभूति करने लगता है । व्यापकता में संपूर्ण प्रकृति का अस्तित्व, विकास और जागृति को अनुभव करने लगता है । इस उपलब्धि के फलस्वरूप ही साधक अनुभव करता है कि जीवन सफल हो गया, जागृति की चरम उपलब्धि हुई । यह उसमें ‘प्राप्त अनुभूति के आनंद’ को परंपरा प्रमाण के रूप में स्थिर कर देता है । ऐसी उपलब्धि के अनंतर रहस्यता के उन्मूलन की दक्षता, व्यवहार में मानवीयता की परिपूर्ण उपादेयता को सिद्ध करने में उनका प्रस्तुतीकरण ही प्रमाण बन जाता है ।

  • # दो - अनुसरण, अनुकरण तथा अध्ययन :- इसका विशद् विश्लेषण पूर्व के अध्यायों में यथा-स्थान किया है, जिसका सारभूत कार्यक्रम है । यह जागृत परंपरागत विधि से सार्थक होता है ।
  • 1. न्यायपूर्ण व्यवहार का अनुकरण अथवा अनुसरण करना ।
  • 2. समाधान पूर्ण (धर्म पूर्ण) विचार में प्रवृत्त होना-रहना ।
  • उपरोक्त दोनों कार्यक्रमों की दृढ़ता एवं निष्ठा की अपेक्षा में सत्यता की अनुभूति का अधिकार परिणाम पूर्वक प्राप्त होता है, फलस्वरूप बुद्धि आप्लावित होती है ।
  • उपरोक्तानुसार जब साधक मानवीयतापूर्ण व्यवहार एवं धर्म पूर्ण विचार में प्रतिष्ठित हो जाता है तब मन, वृत्ति, चित्त तथा बुद्धि सहज क्रियाएं किस प्रकार से संपादित होती है, इसका अनुभूतिपरक वर्णन नीचे दिया गया है ।
  • मन जब वृत्ति का संकेत ग्रहण करने योग्य होता है तब न्यायपूर्ण व्यवहार में परिवर्तित होता है, जो मित्र आशाएं हैं । मैत्री तथा न्याय की प्रत्याशा ही स्नेह के रूप में प्रदर्शित होती है । स्नेह के फलस्वरूप ही सुख तथा न्याय एवं निर्विरोधिता है । मानवीयता के संरक्षणात्मक, परिपालनात्मक और आचरणात्मक नियमों की ही ‘न्याय’ संज्ञा है ।
Page 157 of 219