- ● जीवावस्था में, मन शरीर को जीने की आशा पूर्वक जीवंत बनाये रखते हुये वंशानुषंगीय विधि से कार्य करता है । अत: इसे अजागृत की संज्ञा है । जीवावस्था में बौद्धिक पक्ष अविकसित रहता है । उस अवस्था में मन, शरीर द्वारा नियंत्रित होता है तथा वृत्ति और चित्त उपेक्षित रहते हैं ।
- ● ज्ञानावस्था में बुद्धि तीन अवस्थाओं में परिलक्षित होती है :-
- # (1) अल्प विकसित (अल्प जागृत) - जीवन में इच्छा पूर्वक विचार एवं आशावादी प्रवृत्ति हो तो उसे अल्प जागृत की संज्ञा दी जाती है । इस दशा में मन, वृत्ति, चित्त तंत्रित होते हैं ।
(2) अर्ध विकसित (अर्ध जागृत) - आत्म बोध रहित संकल्प (अवधारणा) पूर्वक इच्छा, विचार व आशा की प्रवृत्ति को अर्ध जागृत की संज्ञा है । इस दशा में मन, वृत्ति व चित्त बुद्धि-तंत्रित होते हैं ।
(3) विकसित (जागृत-पूर्ण जागृत) - आत्म बोध सहित संकल्प पूर्वक इच्छा, विचार, आशा प्रवृत्ति को जागृत की संज्ञा दी जाती है । इस दशा में मन, वृत्ति, चित्त व बुद्धि आत्मा द्वारा नियंत्रित एवं अनुशासित होते हैं ।
- ● केवल वृत्ति और मन के संयोग की स्थिति में मानव जीवन में निद्रा अथवा स्वप्न का कार्य ही सम्पादित होता है । कार्य-व्यवहार में प्रमाणित न होने वाली कल्पनाएँ स्वप्न हैं ।
- ● आत्म बोध पर्यन्त, मानव के द्वारा जागृत, स्वप्न एवम् सुषुप्ति (निद्रा) अवस्था में कायिक, वाचिक तथा मानसिक साधनों से सम्पन्न होने वाले समस्त क्रियाकलाप के मूल में अहंकार ही है । अर्थात् भ्रमित मान्यताएँ ही हैं ।
- ● आत्म बोध रहित बुद्धि की ‘अहंकार’ संज्ञा है । आत्मबोध होने तक अहंकार का अभाव नहीं है ।
- ● इसी अहंकार को चित्रण में ‘अभिमान’ संज्ञा से, वृत्ति में ‘हठ’ संज्ञा से तथा मन में ‘आसक्ति और आवेश’ संज्ञा से जाना जाता है ।
- ● आवेश एवं आसक्ति मानव के जीवन को सफल बनाने में सर्वदा असमर्थ हैं । इसीलिए आवेश एवं आसक्ति के उन्मूलन के लिये अध्ययन, प्रयोग एवं प्रयास है ।