- ● वृति के आश्रय में मन, चित्त के आश्रय में वृति, बुद्धि के आश्रय में चित्त का न होना ही मन और वृति, वृति और चित्त, चित्त और बुद्धि के बीच साविपरीतता है, यही बौद्धिक रहस्य है ।
- # उपरोक्त साविपरीतता को समाप्त करने तथा बौद्धिक रहस्यता अथवा अहंकार का उन्मूलन करने के लिए निश्चित प्रक्रिया है । इस निश्चित प्रक्रिया के अनुसार अभ्यास एवं व्यवहार से ही बौद्धिक रहस्यता का उन्मूलन होता है । ऐसी प्रक्रिया दो प्रकार से गण्य है :-
- # एक -अनुसंधान ।
- # दो - अनुसरण, अनुकरण, अध्ययन ।
- ⁕ एक - अनुसंधान - जो आविष्कारात्मक अनुभूति है, उसका साधक पूरा अध्ययन करता है । पूरे अध्ययन से तात्पर्य है क्रिया की आरंभिक स्थिति अर्थात् ह्रास की अंतिम स्थिति और विकास व जागृति तक अध्ययन करना ।
- ⁕ इस अध्ययन से साधक को यह स्पष्ट होता है कि अंतिम से अंतिम ह्रास एक सूक्ष्म परमाणु या इससे भी सूक्ष्म हो सकता है । यह परिणाम कितना भी सूक्ष्म क्यों न हो, अंततोगत्वा क्रिया ही है । अब उससे यह भी स्पष्ट होता है कि समस्त क्रियाएँ महावकाश में ओत-प्रोत हैं । यह महावकाश शून्य अर्थात् व्यापक वस्तु ही है । इस शून्य की सर्वत्र समान अवस्थिति ही एक मात्र कारण है कि समस्त इकाईयों की क्रिया के लिए समान रूप से प्रेरणा सम्पन्न रहने के लिये सत्ता उपलब्ध है । ऐसे समाधि तप्त साधक में, ज्ञान-विज्ञान-विवेक सफल होता है । जिसने संपूर्ण ह्रास-विकास को देखा है, स्वयम् को देखा है और अपने को सतत् विकासशील सृष्टि के किसी विकासांश में पाया । अब साधक यहाँ से विकास की ओर अध्ययन करता है । अध्ययन पूर्वक यह निर्णय में आता है कि विकास का चरमोत्कर्ष, व्यापक सत्ता में समूची क्रियाएँ अनवरत क्रियाशील हैं, इसी व्यापकता में अनुभूति योग्य क्षमता, योग्यता एवं पात्रता का उपार्जन ही एकमात्र परम पुरुषार्थ है । साधक यह भी अनुभव करता है कि यह मात्र उसका अथवा एक साधक का लक्ष्य नहीं अपितु समूचे मानव का अंतिम लक्ष्य है । अत: ऐसी क्षमता, योग्यता एवं पात्रता को उपार्जित करने के
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द