- ● वृत्ति जब चित्त का संकेत ग्रहण करने योग्य होती है, तब शान्ति सहज अनुभव होता है । विचार की पुष्टि चिन्तन (चित्रण) से ही है । चिन्तन-चित्रण से ही प्रक्रिया, फल और प्रयोजन का निर्णय होता है ।
- # अत: मन, वृत्ति तथा चित्त की एकसूत्रता से (परानुक्रमता से) न्यायपूर्ण व्यवहार के लिए मित्र आशाएं जन्मती हैं जो प्रक्रिया, फल और प्रयोजन का निर्णय करती हैं, जिसे ‘धर्म पूर्ण विचार’ संज्ञा है ।
- ● चित्त जब बुद्धि का संकेत ग्रहण करने योग्य होता है तब संतोष सहज अनुभूति होती है । फलस्वरूप स्वायत्त मानव जीवन का प्रादुर्भाव होता है अर्थात् मानव स्वतंत्रित होता है ।
- ⁕ ऐसे स्वतंत्र मानव में अधिक उत्पादन, कम उपभोग तथा अपव्यय का अत्याभाव होता है और वह अधिकाधिक जागृति के लिए प्रेरणा स्त्रोत होता है । मानव में स्वतंत्रता की तृषा पाई ही जाती है ।
- ● मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि एकसूत्रता से न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार के लिए सत्य प्रतीति होता है ।
- ● बुद्धि जब आत्मा का संकेत ग्रहण करने योग्य विकास को पाती है, तब ‘स्व-बोध’ होता है, यही ‘आत्मबोध’ हैं । आत्मबोध से सत्य संकल्प होता है । सत्य संकल्प मात्र सत्य पूर्ण एवं सत्यपूर्ण आचरण ही है ।
- ● मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि आत्मानुशासित होने पर न्यायपूर्ण व्यवहार, धर्म पूर्ण विचार में सत्यानुभूति के कारण प्रतिष्ठित होता है ।
- ● निश्चयात्मक निरंतरता ही संकल्प है । निश्चय सहित चित्रण ही योजना है तथा योजना सहित विचार ही समाधान सहज अभिव्यक्ति है ।
- ● पूर्वानुषंगिक संकेत ग्रहण योग्यता का प्रादुर्भाव शक्ति की अंतर्नियामन प्रक्रिया से ही है । यह व्यवहार का विचार में, विचार का इच्छा में, इच्छा का संकल्प में तथा संकल्प का अनुभव में अथवा मध्यस्थ क्रिया में प्रत्यावर्तन ही है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द