- ● अपराध के अभाव में आशा का प्रत्यावर्तन, अन्याय के अभाव में विचार का प्रत्यावर्तन, आसक्ति के अभाव में इच्छा का प्रत्यावर्तन तथा अज्ञान के अभाव में संकल्प का प्रत्यावर्तन होता है ।
- # अत: अपराधहीन व्यवहार के लिए व्यवस्था का दबाव एवं प्रभाव, अन्यायहीन विचार के लिए सामाजिक आचरण का प्रभाव, आसक्ति रहित इच्छा के लिए अध्ययन एवं संस्कार का प्रभाव तथा अज्ञान रहित बुद्धि के लिए अन्तर्नियामन अथवा ध्यान आवश्यक है, जिससे ही प्रत्यावर्तन क्रिया सफल है अथवा असफल है । ध्यान का अर्थ समझने के लिए मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि को केन्द्रित करना और समझने-अनुभव करने के उपरांत प्रमाणित करने के लिए मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि को केंद्रित करना । अर्थबोध होने के लिए तथा अर्थ बोध को प्रमाणित करने के लिए ध्यान होना आवश्यक है । यही ध्येय है । सर्वमानव ध्याता है ।
- ⁕ अत: यह निष्कर्ष निकलता है कि मानवीयतापूर्ण व्यवस्था, सामाजिक आचरण, अध्ययन और संस्कार के साथ ही अंतर्नियामन आवश्यक है, जिससे चरम विकास (जागृति) की उपलब्धि संभव है ।
- ● न्याय पूर्ण व्यवहार, धर्मपूर्ण विचार तथा सत्यानुभूतिपूर्ण इच्छा संपन्न हो जाना ही पूर्ण जागृति है ।
- ● व्यवहार में गलती एवं अपराध का न होना ही पूर्ण जागृति का लक्षण है । इसे मानव की परस्परता में देखा भी जाता है । न्याय, धर्म, सत्य पूर्वक जीना ही पूर्ण जागृति है ।
- # मानव को अध्यात्मिक (व्यापक पक्ष), अधिदैविक (बौद्धिक पक्ष), और अधिभौतिक (जड़ पक्ष) का दर्शन, अध्ययन व प्रयोग करने का अवसर प्राप्त है । सहअस्तित्व में अनुभव व प्रयोग करने का अधिकार हर नर नारी को प्राप्त है ।
- # रहस्य के मूल में अहंकार अथवा भ्रम ही है ।
- # सत्यबोध के अभाव में चित्त में होने वाली चित्रण क्रिया में अतिव्याप्ति, अनाव्याप्ति अथवा अव्याप्ति दोष का रहना अनिवार्य है । फलत: काल्पनिक आरोप चित्रण में होगा ही । चित्रण में इस काल्पनिक आरोप की ‘अभिमान’ अथवा भ्रम संज्ञा है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द