- ⁕ मन से वृति, वृत्ति से चित्त, चित्त से बुद्धि श्रेष्ठ प्रक्रिया है । अत: इसी क्रमिक अधिकार भेद से उनका परस्पर नियंत्रण है ।
- ● मानवयीतापूर्ण दृष्टि, स्वभाव और विषय पर अधिकार पाने के पश्चात् ही देव मानवीयता तथा दिव्य मानवीयता के लिए जो शेष प्रयास हैं, उसे करने में साधक प्रवृत्त होता है ।
- ● आत्मबोध ही आध्यात्मिक उपलब्धि है ।
- # अन्तर्नियामन प्रक्रिया द्वारा ही आत्म बोध होता है, जो ध्यान देने की चरम उपलब्धि है । यह ही जागृति है । ऐसे आत्म बोध (अनुभव बोध) सम्पन्न मानव की, जागृत मानव संज्ञा है तथा यही प्रमाण रूप में मानव, देवमानव, दिव्य मानव होना पाया जाता है ।
- ● अवधारणा के अनन्तर आत्मा की ओर बुद्धि का प्रत्यावर्तन होते ही आत्म बोध तथा ब्रह्मानुभूति (सह अस्तित्व में अनुभूति) एक साथ ही प्रभावशील होती है । प्रभावित हो जाना ही उपलब्धि है । ऐसी उपलब्धि बुद्धि को आप्लावित किये रहती है ।
- ● ऐसे ब्रह्मानुभूत आचरण प्रमाण सम्पन्न इकाई को मानव, देव मानव, दिव्य मानव की संज्ञा है जो सतत प्रेरणा का श्रोत है ।
- ● मानव अपनी तथा अन्य मानव, देवमानव, दिव्य मानव, देवात्मा व दिव्यात्मा की प्रेरणा से, अनुग्रह से तथा अनुकम्पा से अध्ययन पूर्वक जागृत होना चाहता है, जिससे वह भी देवत्व तथा दिव्यत्व की उपलब्धि कर सकें ।
- ● जागृत मानव अजागृत मानव का मार्गदर्शक है ही तथा मार्गदर्शन करता ही है ।
- ⁕ सामाजिकता की ‘अपेक्षा’ उसके योग्य वैचारिक संवेदनशीलता से है । वैचारिक परिमार्जन आवश्यक है, क्योंकि सामाजिकता का संरक्षण सम्पर्कों एवम् सम्बन्धों के निर्वाह से है । सामाजिकता का निर्वाह परिमार्जित विचार एवम् संज्ञानपूर्ण व्यवहार से ही है । ऐसे परिमार्जित विचार एवम् व्यवहार, मात्र मानवीयता एवम् अतिमानवीयता से सम्पन्न होने पर ही सम्भव है । यही जागृति है ।
- ⁕ जड़ पक्ष पर जागृत मानव सहअस्तित्व सहज संतुलन को बनाये रखने के लिए नियन्त्रण करने का अधिकार सम्पन्न रहता है । इसी नियंत्रण (ज्ञान) सहअस्तित्व में
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द