- ● दूसरों के कष्ट, दुःख, वेदना एवम् संकट के प्रति मानव में संवेदना होती ही है, जो ज्ञानानुभूति की सक्षमता अथवा संभावना के कारण है ।
- ● ज्ञानानुभूति की योग्यता मानव के जागृति पर; मानव की जागृति संस्कारों पर; संस्कारों का विकास वातावरण, अध्ययन व प्रयास पर; वातावरण, अध्ययन व प्रयास मानवीयता, अतिमानवीयता पर; मानवीयता, अतिमानवीयता ज्ञानानुभूति की योग्यता पर निर्भर करती है ।
- ● स्वस्वरूप ही आत्मा (मध्यस्थ क्रिया) है । मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि से आत्मा सहज अनुभव श्रेष्ठ क्रिया है । फलस्वरूप ही आत्मा के प्रभाव से पूर्णतया प्रभावित न होने तक बुद्धि में आनन्दानुभूति, चित्त में सन्तोषानुभूति, वृत्ति में शान्ति की अनुभूति तथा मन में सुखानुभूति नहीं है ।
- ● जो सुखी नहीं है, वह दूसरों को सुखी नहीं कर सकता । जो सुखी नहीं है, वह दुःखी ही होगा तथा जिसके पास जो होगा वह उसी का बंटन कर सकेगा ।
- ● बुद्धि को आत्मबोध व व्यापकता सहज अनुभव बोध का अवसर है । इसीलिये ऐसी अनुभूति के अनन्तर सर्वतोमुखी समाधान व समझ सुलभ है ।
- ● विकसित इकाई अविकसित इकाई के अनुरूप व्यवहार और विचार से ह्रास की ओर गतित होती है जैसे मानव जीवों से विकसित है पर जीवों के सदृश्य व्यवहार, विहार एवं आहार के प्रयास से ही ह्रास की ओर गतित है ।
- ● आसक्तिवश ही गुरु मूल्य का लघु मूल्य की ओर झुकाव है, जो अवमूल्यन है । गुरु मूल्य को लघु मूल्य के लिए प्रायोजित एवं नियोजित करने के लिए भ्रम का रहना अनिवार्य है ।
- ● यथार्थता से भिन्न मान्यता ही ‘भ्रम’ है ।
- ● ह्रास की सूचना रहते हुए भी विकास के स्पष्ट ज्ञान एवम् निष्ठा के अभाव में मानव विवशता पूर्वक अर्थात् भ्रमपूर्वक पतन की ओर गतित है ।
- # अपराधहीन व्यवहार के लिये सार्वभौम व्यवस्था की प्रेरणा, न्यायपूर्ण विचार के लिये सामाजिक आचरण का प्रभाव, धर्मपूर्ण इच्छा के लिये अध्ययन एवम् सुसंस्कार का
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द