- ⁘ परार्थ :- दूसरों की सुख सुविधा के लिये जो विचार एवं व्यवहार और इसकी पूर्ति के लिये अर्थ नियोजन की प्राथमिकता ही परार्थ है ।
- ⁘ परमार्थ :- जिस विचार एवं व्यवहार में समाधान सहित सर्वशुभ की उपलब्धि हो और समस्या का निराकरण हो और स्नेह का ही संबंध हो, इसे सर्व सुलभ कराने के लिये जो अर्थ नियोजन है, उसकी परमार्थ संज्ञा है ।
- ⁕ उपरोक्त नियम ही विभिन्न प्रकार की गठित सामाजिक इकाईयों के लिये भी लागू होगा। जिससे विभिन्नता समाप्त होकर, मानवीयता स्थापित होगी ।
- # अर्थ मात्र तीन ही हैं :- मन, तन, धन ।
- ● बौद्धिक प्रयोग एवं प्रयास से बौद्धिक समाधान तथा भौतिक प्रयोग, प्रयास एवं उत्पादन से भौतिक समृद्धि की उपलब्धि होती है । बौद्धिक समाधान और भौतिक समृद्धि सामाजिकता के विकास के लिये सहायक है ।
- # भौतिक समृद्धि के लिये प्राकृतिक वैभव का उपयोग एवं सदुपयोग अनिवार्य है । खनिज, वनस्पति और पशु-पक्षी प्राकृतिक वैभव है ।
- # प्राकृतिक वैभव के उपयोग और सदुपयोग के लिये श्रम रूपी अर्थ का नियोजन आवश्यक है ।
- ⁕ अर्थ :- तन, मन एवं धन का नियोजन, मानवीय तथा अतिमानवीय भेद से प्रयुक्त करने से सामाजिकता का विकास है ।
- ● अमानवीय समुदायों के गठन के मूल में भ्रमित मानवों व बलवान जीवों अर्थात् क्रूरता का भय है ।
- # इसी प्रकार मानव समुदाय गठन के मूल में प्राकृतिक भय, पाशवीय भय तथा मानव में निहित अमानवीयता के भय से मुक्त होना लक्ष्य है ।
- ● मानव मात्र द्वारा समस्त प्रयास एवं प्रयोग तृप्ति अथवा सुख के लिये है ।
- ● ऐन्द्रिय (भौतिक), बौद्धिक (वैचारिक) एवं आध्यात्मिक(अनुभूति) भेद से तृप्तियाँ अथवा सुख है ।
Table of contents
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-20
मानव व्यवहार दर्शन
-19
विकल्प
-14
मध्यस्थ दर्शन के मूल तत्व
-8
लेखकीय
-6
संदेश
-4
मध्यस्थ दर्शन में प्रतिपादित मूल बिन्दु
-2
कृतज्ञता
1
1. सहअस्तित्व
4
2. कृतज्ञता
6
3. सृष्टि-दर्शन
17
4. मानव सहज प्रयोजन
47
5. निर्भ्रमता ही विश्राम
60
6. कर्म एवं फल
62
7. मानवीय व्यवहार
68
8. पद एवं पदातीत
70
9. दर्शन-दृश्य-दृष्टि
78
10. क्लेश मुक्ति
84
11. योग
87
12. लक्षण, लोक, आलोक एवं लक्ष्य
95
13. मानवीयता
99
14. मानव व्यवहार सहज नियम
113
15. मानव सहज न्याय
124
16. पोषण एवं शोषण
132
(i) मानव धर्म नीति
Subsection
143
(ii) मानव राज्य-नीति
152
17. रहस्य मुक्ति
169
18. सुख, शांति, संतोष और आनन्द